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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  2.14.161 
वयसे ‘मध्यमा’ तेंहो स्वभावेते ‘समा’ ।
गाढ़ प्रेम - भावे तेंहो निरन्तर ‘वामा’ ॥161॥
 
 
अनुवाद
"राधारानी बड़ी हो गई हैं, और उनका चरित्र संतुलित है। वे सदैव आनंद-विभोर प्रेम में लीन रहती हैं और सदैव एक वाममार्गी गोपी के भाव में रहती हैं।"
 
Radharani is mature and has a disposition of impartiality. She is always immersed in intense love and constantly experiences the emotions of the left-sided gopis.
तात्पर्य
रूप गोस्वामी ने अपने उज्ज्वल-नीलमणि (सखी-प्रकरण 26 और 32) ग्रंथ में गोपियों के बाएँ और दाएँ पक्षों की व्याख्या की है। बाएँ पक्ष का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

मान-ग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना

अभेद्‍या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्यते

"जो गोपी हमेशा ईर्ष्यालु क्रोध करने के लिए उत्सुक रहती है, जो उस स्थिति के लिए बहुत उत्साही होती है, जो हारने पर तुरंत क्रोधित हो जाती है, जो किसी नायक के नियंत्रण में कभी नहीं रहती और हमेशा उसका विरोध करती है उसे वामा या बाएँ पक्ष की गोपी कहा जाता है।"

श्रील रूप गोस्वामी दाएँ पक्ष की गोपियों का वर्णन इस प्रकार करते हैं:

असह्या मान-निर्बन्धे नायके युक्त-वादिनी

साम्‍याभिस तेन भेद्या च दक्षिणा परिकीर्तिता

"जो गोपी महिला क्रोध को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जो नायक से उचित शब्द बोलती है और उसके मीठे शब्दों से संतुष्ट हो जाती है उसे दक्षिणा या दाएँ पक्ष की गोपी कहा जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)