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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.14.16 
एइ देख , - चैतन्येर कृपा - महाबल ।
तार अनुसन्धान विना कराय सफल ॥16॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा कितनी शक्तिशाली है! राजा के बारे में पूछे बिना ही, भगवान ने सब कुछ सफल कर दिया।
 
How powerful is the grace of Sri Chaitanya Mahaprabhu! Mahaprabhu made every task successful without even asking the king.
तात्पर्य
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा इतनी शक्तिशाली है कि वो खुद-ब-खुद काम करती है । अगर कोई व्यक्ति भगवान कृष्ण की भक्ति करता है, तो उसकी भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती है । वो एक आध्यात्मिक खाते में दर्ज हो जाती है और सही समय पर फल देती है । इसका प्रमाण श्रीमद्भगवद्गीता (2.40) में मिलता है:

"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम प्यास्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||"

"इस प्रयास में कोई कमी नहीं होती या नुकसान नहीं होता है, और इस पथ पर थोड़ी सी प्रगति भी मनुष्य को भयंकर से भयंकर डर से बचा सकती है ।"

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस युग के पतित प्राणियों को भक्ति करने का सबसे प्रभावकारी तरीका दिया है, और वो है संकीर्तन । संकीर्तन का मतलब है भगवान के पवित्र नाम का सामूहिक रूप से कीर्तन करना । और जो भी व्यक्ति भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से संकीर्तन करता है, वो तुरंत आध्यात्मिक स्थिति पर पहुँच जाता है । जैसे की श्रीमद्भागवतम् (11.5.32) में लिखा है, "यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर् यजन्ति हि सुमेधसः।"

भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति करने वाले को भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करनी चाहिए । तब उसकी भक्ति शीघ्र ही सफल होगी । ऐसा ही राजा प्रतापरुद्र के साथ हुआ था । भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें देखा और उनकी थोड़ी सी निःस्वार्थ सेवा ने भगवान को überzeugt कर दिया कि वो भगवत प्राप्ति के लिए उचित उम्मीदवार हैं । पहले महाराजा प्रतापरुद्र को भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने का मौका नहीं मिला, लेकिन जब भगवान ने देखा कि राजा एक निम्न श्रेणी के सफाई कर्मी के रूप में भगवान जगन्नाथ की सेवा कर रहे है, तो राजा पर भगवान की कृपा एक सच्ची चीज बन गई । जब महाराजा प्रतापरुद्र एक वैष्णव के वेश में भगवान की सेवा कर रहे थे, तो भगवान ने यह भी नहीं पूछा कि वो कौन हैं । इसके बजाय, उन्होंने उन पर दया की और उन्हें अपने गले लगा लिया ।

कृष्णदास कविराज गोस्वामी ये बताना चाहते हैं कि महाराजा प्रतापरुद्र के प्रति भगवान की कृपा की तुलना किसी भी चीज़ से नहीं की जा सकती है । इसलिए वो ये शब्दों का प्रयोग करते हैं, "देखा" ("बस देखिए") और "चैतन्येरा कृपा-महाबल" ("भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा कितनी शक्तिशाली है") । प्रबोधानंद सरस्वती ने भी इस बात का समर्थन किया है: यत्-कारुण्य-कटाक्ष-वैभव-वताम (चैतन्य-चंद्रामृत 5) । भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की एक थोड़ी सी भी कृपा आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक बड़ी संपत्ति मानी जाती है । इसलिए भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा के द्वारा ही कृष्ण चेतना आंदोलन को फ़ैलाया जाना चाहिए । जब रूप गोस्वामी ने भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा और महानता का अनुभव किया, तो उन्होंने कहा:

"नमो महा-वदाण्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते |

कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः ।।"

"मैं परम दयालु भगवान श्री कृष्ण चैतन्य को नमन करता हूँ, जो किसी भी दूसरे अवतार से भी ज्यादा महान हैं, स्वयं भगवान कृष्ण से भी, क्योंकि वो वो दे रहे हैं जो किसी दूसरे ने कभी नहीं दिया - कृष्ण प्रेम ।" श्रील लोचन दास ठाकुर ने भी गाया है, परम करुण, पाहुँ दुई जन, नितै-गौरचंद्र: "भाई नित्यानंद और गौरचंद इतने दयालु हैं कि उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है ।" उसी तरह, श्रील नरसिंह दास ठाकुर ने गाया है:

"व्रजेन्द्र-नंदन येई, शची-सुता हइला सेई,

बलराम हइल नितै ।

दीन-हीन याता चिला, हरि-नामे उद्धारिला,

तारा साक्षी जगै-माधै ।।"

"इस युग के सभी पापियों को पवित्र नाम का प्रचार करके उबारने के लिए, भगवान कृष्ण और भगवान बलराम, श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं । जगै और माधै इनकी सफलता के प्रमाण हैं ।"

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का विशेष उद्देश्य कलि-युग के सभी पतित प्राणियों को उद्धार दिलाना है । भगवान कृष्ण के भक्तों को भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा और अनुग्रह पाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए ताकि वो भगवत प्राप्ति के लिए योग्य बन सकें ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)