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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.14.157 
गोपिकार प्रेमे नाहि रसाभास - दोष ।
अतएव कृष्णेर करे परम सन्तोष ॥157॥
 
 
अनुवाद
“गोपियों के प्रेम में कोई दोष या मिलावट नहीं है; इसलिए वे कृष्ण को सर्वोच्च आनंद देती हैं।
 
“There is no flaw or adulteration in the love of the Gopis, and therefore they give Krishna ultimate satisfaction.
तात्पर्य
रसाभास तब होता है जब कृष्ण के साथ हमारा संबंध दोषपूर्ण होता है। रसाभास के विभिन्न प्रकार होते हैं—प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और तृतीय श्रेणी। शब्द रस का अर्थ है "मधुरता", और आभास का अर्थ है "छाया"। यदि व्यक्ति एक प्रकार की मधुरता का स्वाद लेता है और उसमें कुछ अतिरिक्त डाल दिया जाता है, तो उसे उपरस कहते हैं। अगर कुछ मूल मधुरता से लिया गया है, तो इसे अनुरस कहा जाता है। अगर कुछ इस तरह से सराहा जाता है जो मूल मधुरता से बहुत दूर है, तो इसे अपरस कहा जाता है। उपरस, अनुरस और अपरस क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी के रसाभास हैं। जैसा कि भक्ति-रसामृत-सिंधु (4.9.1-2) में कहा गया है:

पूर्वम एवानुशिष्टेन विकला रस-लक्षणा

रसा एव रसाभासा रस-ज्ञैर अनुकीर्तिताः

स्युस्त्रिधोपरसाश्चानु- रसाश्चापरसाश्च ते

उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्य मी क्रमः

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)