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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.14.133 
बान्धिया आनिया पाड़े लक्ष्मीर चरणे ।
चोरे येन दण्ड करि’ लय नाना - धने ॥133॥
 
 
अनुवाद
दासियों ने जगन्नाथ के सेवकों को बाँध दिया, हथकड़ियाँ डाल दीं और उन्हें भाग्य की देवी के चरणों में गिरा दिया। सचमुच, उन्हें वैसे ही गिरफ्तार किया गया जैसे चोरों का सारा धन छीन लिया जाता है।
 
The maids bound and handcuffed Jagannath's servants and forced them to fall at the feet of Lakshmi. They were all imprisoned like thieves who had looted wealth.
तात्पर्य
जब भगवान जगन्नाथ अपना रथ यात्रा आरंभ करते हैं, तो वे भाग्य की देवी को आश्वासन देते हैं कि वे अगले दिन अवश्य लौटेंगे। जब वे नहीं लौटते, तो दो या तीन दिन प्रतीक्षा करने के बाद भाग्य की देवी को लगने लगता है कि उनके पति ने उनकी उपेक्षा की है। स्वाभाविक रूप से वह काफी क्रोधित हो जाती है। अपने और अपने सहयोगियों को भव्य रूप से सजा कर, वह मंदिर से बाहर आती हैं और मुख्य द्वार के सामने खड़ी हो जाती हैं। भगवान जगन्नाथ के सभी प्रमुख सेवकों को उनकी दासी गिरफ्तार कर लेती हैं, उनके सम्मुख ले जाती हैं और उनके चरणों में गिरने के लिए विवश करती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)