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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.13.61 
साक्षाते ना देय देखा, परोक्षे त’ दया ।
के बुझिते पारे चैतन्य - चन्द्रेर माया ॥61॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि राजा को साक्षात्कार देने से मना कर दिया गया था, फिर भी उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से अहैतुकी कृपा प्राप्त हुई। श्री चैतन्य महाप्रभु की आंतरिक शक्ति को कौन समझ सकता है?
 
Although the king was denied an audience, he was indirectly bestowed with causeless grace. Who can understand the inner power of Sri Chaitanya Mahaprabhu?
तात्पर्य
चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु विश्व शिक्षक की भूमिका निभा रहे थे, इस कारण वह राजा से मिलने को राजी नहीं हुए, क्योंकि राजा एक लौकिक व्यक्ति होता है जो धन और स्त्रियों में रुची रखता है। वास्तव में, "राजा" शब्द स्वयं ही इस बात का सुझाव देता है कि वह सदैव धन और स्त्रियों से घिरा रहता है। एक संन्यासी के रूप में, श्री चैतन्य महाप्रभु धन और स्त्रियों दोनों से डरते थे। "राजा" शब्द स्वयं ही त्यागसहिष्णु जीवन-क्रम के व्यक्ति के लिए घृणित होता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने राजा से मिलने से इनकार कर दिया, लेकिन परोक्ष रूप से, भगवान की निःकारण कृपा से, राजा भगवान की रहस्यमयी गतिविधियों को समझ पाने में सक्षम हो सका। भगवान चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियाँ कभी-कभी उन्हें भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व रूप में प्रकट करने के लिए प्रदर्शित की जाती थीं और कभी-कभी उन्हें एक भक्त के रूप में दिखाने के लिए। दोनों प्रकार की गतिविधियाँ रहस्यमयी होती हैं और केवल शुद्ध भक्तों द्वारा ही उनकी सराहना की जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)