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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.13.150 
व्रज - वासी यत जन, माता, पिता, सखा - गण,
सबे हय मोर प्राण - सम ।
ताँर मध्ये गोपी - गण, साक्षात्मोर जीवन ,
तुमि मोर जीवनेर जीवन ॥150॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण ने आगे कहा: "वृन्दावन-धाम के सभी वासी - मेरे माता, पिता, ग्वाल-सखा और अन्य सभी - मेरे प्राण और आत्मा के समान हैं। और वृन्दावन के सभी वासियों में गोपियाँ ही मेरे प्राण और आत्मा हैं। और गोपियों में, आप, श्रीमती राधारानी, ​​प्रमुख हैं। इसलिए आप ही मेरे प्राण हैं।"
 
Shri Krishna continued, "All the residents of Vrindavan—my mother, father, cowherds, and others—are like my life. Of all the residents of Vrindavan, the gopis are like my life, and among the gopis, O Radharani, you are the chief. Therefore, you are the life of my life as well."
तात्पर्य
श्रीमती राधारानी वृन्दावन की सभी गतिविधियों का केंद्र हैं। वृन्दावन में, कृष्ण श्रीमती राधा-रानी के वाद्य हैं; इसलिए वृंदावन के सभी निवासी अब भी "जय राधे!" का जप करते हैं। कृष्ण के इस कथन से, यह प्रतीत होता है कि राधा-रानी वृंदावन की रानी हैं और कृष्ण उनकी सजावट मात्र हैं। कृष्ण को मदन-मोहन के नाम से जाना जाता है, कामदेव के मोहक, लेकिन श्रीमती राधारानी कृष्ण की मोहक हैं। अतः श्रीमती राधारानी को मदन-मोहन-मोहिनी अर्थात कामदेव के मोहक की मोहक कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)