| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य » श्लोक 144 |
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| | | | श्लोक 2.13.144  | विदग्ध, मृदु, सद्गुण, सुशील, स्निग्ध, करुण ,
तुमि, तोमार नाहि दोषाभास ।
तबे ये तोमार मन, नाहि स्मरे व्रज - जन,
से - आमार दुर्दैव - विलास ॥144॥ | | | | | | | अनुवाद | | "कृष्ण, आप निस्संदेह सभी गुणों से युक्त एक सुसंस्कृत सज्जन हैं। आप शिष्ट, कोमल हृदय और दयालु हैं। मैं जानता हूँ कि आपमें लेशमात्र भी दोष नहीं है। फिर भी आपका मन वृंदावनवासियों का स्मरण तक नहीं करता। यह केवल मेरा दुर्भाग्य है, और कुछ नहीं।" | | | | "O Krishna, you are a noble and well-mannered person endowed with all the good qualities. You are virtuous, humble-hearted, and compassionate. I know that you have not the slightest flaw, yet your mind does not even think of the residents of Vrindavan. What else could this be but our misfortune?" | | ✨ ai-generated | | |
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