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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.13.141 
नहे गोपी योगेश्वर, पद - कमल तोमार
ध्यान करि’ पाइबे सन्तोष ।
तोमार वाक्य - परिपाटी, तार मध्ये कुटिनाटी
शुनि’ गोपीर आरो बाढ़े रोष ॥141॥
 
 
अनुवाद
"गोपियाँ योगियों जैसी नहीं हैं। वे केवल आपके चरणकमलों का ध्यान करने और तथाकथित योगियों का अनुकरण करने मात्र से कभी संतुष्ट नहीं होंगी। गोपियों को ध्यान की शिक्षा देना एक और प्रकार का कपट है। जब उन्हें योगाभ्यास करने का निर्देश दिया जाता है, तो वे बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं होतीं। इसके विपरीत, वे आपसे और अधिक क्रोधित होती जाती हैं।"
 
"The gopis are not like the yogis. They will never be satisfied by merely meditating on your lotus feet and imitating so-called yogis. Teaching meditation to the gopis is another form of deception. When they are instructed to practice yoga, they are not satisfied at all. On the contrary, they become even more angry with you."
तात्पर्य
श्रील प्रबोधानंद सरस्वती (चैतन्य-चंद्रामृत 5):

कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते

दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खात-दंष्ट्रायते

विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेंद्रादिश् च कीटायते

यत् कारुण्य-कटाक्ष-वैभव-वतां तं गौरामेव स्तुमः

श्री चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से कृष्ण-भावना प्राप्त करनेवाले शुद्ध भक्त के लिए वो अद्वैतवादी दर्शन, जिसमें व्यक्ति स्वयं को सर्वोच्च के साथ एक मानता है, नारकीय है। साधनात्मक योग पद्धति जिसमें चित्त को नियंत्रित किया जाता है और इंद्रियों को वशीभूत किया जाता है, भी एक शुद्ध भक्त को हास्यास्पद लगता है। भक्त का चित्त और इंद्रियाँ तो पहले से ही प्रभु की दिव्य सेवा में लगी हैं। इस तरह से इंद्रिय-व्यापारों के विषैले प्रभाव दूर हो जाते हैं। यदि व्यक्ति का चित्त सदा प्रभु की सेवा में लगा रहे तो भौतिकता की ओर सोचने, भावना करने व कार्य करने की संभावना नहीं रह जाती। ठीक इसी तरह, कर्म करनेवालों का स्वर्गलोक प्राप्त करने का प्रयास भक्त के लिए महज एक जादू का ख़याली खेल है। आख़िरकार, स्वर्गलोक भी भौतिक ही तो हैं, और उनका भी उचित समय पर विनाश हो जाता है। भक्तों को ऐसी क्षणिक चीज़ों से कोई मतलब नहीं होता। वे दिव्य भक्ति-भाव से युक्त क्रियाकलापों में संलग्न होते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक संसार में ऊपर उठने की आकाँक्षा रखते हैं, जहाँ वे सदा के लिए शांति से और कृष्ण के पूर्ण ज्ञान के साथ रह सकते हैं। वृंदावन में गोपियाँ, ग्वाले और यहाँ तक कि बछड़े, गायें, पेड़-पौधे और पानी भी कृष्ण के प्रति पूर्णत: जागरूक हैं। वे कृष्ण के सिवाय किसी चीज़ से कभी संतुष्ट नहीं होते।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)