अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतम्
आनकूलेन कृष्णानु- शीलनं भक्तिर उत्तमा
एक विशुद्ध भक्त के लिए रहस्य योग साधना या सैद्धांतिक दर्शन की साधना में लिप्त होने का कोई अवसर नहीं होता है। एक विशुद्ध भक्त के लिए अपने मन को ऐसी अनचाही गतिविधियों में लगाना निश्चित रूप से असंभव है। भले ही एक विशुद्ध भक्त ऐसा करना चाहे, उसका मन उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं देगा। यह एक विशुद्ध भक्त की विशेषता है - वह सभी लाभकारी गतिविधि, सैद्धांतिक दर्शन और रहस्यवादी योग ध्यान से परे है। इसलिए गोपियों ने अपने आप को इस प्रकार व्यक्त किया।
