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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  2.13.139 
पूर्वे उद्धव - द्वारे, एबे साक्षातामारे ,
योग - ज्ञाने कहिला उपाय ।
तुमि - विदग्ध, कृपामय, जानह आमार हृदय ,
मोरे ऐछे कहिते ना युयाय ॥139॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रिय कृष्ण, पूर्वकाल में, जब आप मथुरा में निवास करते थे, तब आपने उद्धव को मुझे चिन्तन और योग की शिक्षा देने के लिए भेजा था। अब आप स्वयं भी यही बात कह रहे हैं, परन्तु मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा है। मेरे मन में ज्ञान-योग या ध्यान-योग के लिए कोई स्थान नहीं है। यद्यपि आप मुझे भली-भाँति जानते हैं, फिर भी आप मुझे ज्ञान-योग और ध्यान-योग की शिक्षा दे रहे हैं। ऐसा करना आपके लिए उचित नहीं है।"
 
"O Krishna, when you were living in Mathura earlier, you sent Uddhava to teach me yoga and knowledge. Now you are saying the same thing yourself, but my mind does not accept it. There is no place in my mind for either jnana yoga or dhyana yoga. Even though you know me well, you are still preaching jnana yoga and dhyana yoga. This is not appropriate for you."
तात्पर्य
रहस्यवादी योग की प्रक्रिया, परम निरपेक्ष सत्य की खोज के लिए एक अनुमानपरक विधि, उस व्यक्ति को आकर्षित नहीं करती जो हमेशा कृष्ण के विचारों में लीन रहता है। एक भक्त को अटकलबाजी वाले कार्यों में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। अटकलबाजी वाले ज्ञान का विकास करने या रहस्यवादी योग का अभ्यास करने के बजाय, एक भक्त को मंदिर में देवता की पूजा करनी चाहिए और लगातार भगवान की सेवा में संलग्न रहना चाहिए। मंदिर देवता की पूजा को भक्तों द्वारा स्वयं प्रभु की प्रत्यक्ष सेवा के समान समझा जाता है। देवता को अर्चा-विग्रह या अर्चा-अवतार के रूप में जाना जाता है, जो कि भौतिक अभिव्यक्ति (पीतल, पत्थर या लकड़ी) के रूप में सर्वोच्च भगवान का अवतार है। अंततः कृष्ण के रूप में पदार्थ या भावना में कोई अंतर नहीं है क्योंकि दोनों उसकी ऊर्जाएँ हैं। कृष्ण के लिए, पदार्थ और भावना के बीच कोई भेद नहीं है। इसलिए, भौतिक रूप में उसकी अभिव्यक्ति उसके मूल रूप, सच्चिदानंद-विग्रह के समान है। शास्त्रों में बताए गए नियमों और विनियमों के अनुसार देवता पूजा में लगातार लगे रहने वाला भक्त और आध्यात्मिक गुरु द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार gradualmente महसूस करता है कि वह ईश्वर के परम व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष संपर्क में है। इस प्रकार वह तथाकथित ध्यान, योग अभ्यास और मानसिक सोच में अपनी रुचि खो देता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)