श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.13.128 
इहाँ लोकारण्य, हाती, घोड़ा, रथ - ध्वनि ।
ताहाँ पुष्पारण्य, भृङ्ग - पिक - नाद शुनि ॥128॥
 
 
अनुवाद
"कुरुक्षेत्र में लोगों की भीड़, हाथी-घोड़े और रथों की गड़गड़ाहट होती है। लेकिन वृंदावन में फूलों के बगीचे हैं, और मधुमक्खियों की भिनभिनाहट और पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है।
 
Kurukshetra is crowded with people; their elephants, horses, and chariots rumble loudly. But Vrindavana is full of flower gardens, and in them one can hear the humming of bees and the chirping of birds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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