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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.12.61 
एइ - महा - भागवत, याँहार दर्शने ।
व्रजेन्द्र - नन्दन - स्मृति हय सर्व - जने ॥61॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "यह एक महान भक्त है। इसे देखकर, हर कोई महाराज नंद के पुत्र, भगवान कृष्ण का स्मरण कर सकता है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Here is a great devotee. Seeing him, one will be reminded of Lord Krishna, the son of Nanda Maharaja."
तात्पर्य
अपने अनुभाष्य में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि एक भौतिकवादी व्यक्ति शरीर और मन को भौतिक आनंद का स्रोत मान लेता है। दूसरे शब्दों में, एक भौतिकवादी व्यक्ति जीवन की शारीरिक अवधारणा को स्वीकार करता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने महाराजा प्रतापरुद्र के पुत्र को इस विचार से नहीं देखा कि वह भौतिकवादी है, क्योंकि वह एक भौतिकवादी का पुत्र है। न ही उन्होंने स्वयं को भोक्ता माना। मायावादी दार्शनिक यह मानकर एक बड़ी गलती करते हैं कि सत्-चित्-आनंद-विग्रह, भगवान का पारलौकिक रूप, एक भौतिक शरीर की तरह है। हालाँकि, पारलौकिकता में कोई भौतिक संदूषण नहीं होता है, न ही पदार्थ में आध्यात्मिकता की कल्पना करने की कोई संभावना होती है। कोई पदार्थ को आत्मा के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। जैसा कि तकनीकी शब्द भौम इज्या-धीः (भाग। 10.84.13) द्वारा इंगित किया गया है, भौतिकवादी मायावादी ईश्वर के रूप की कल्पना पदार्थ में करते हैं, हालांकि उनकी कल्पना के अनुसार, ईश्वर अंततः निराकार है। यह केवल मानसिक अटकल है। भले ही श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की सर्वोच्च हस्ती हैं, उन्होंने खुद को एक गोपी की स्थिति में रखा। उन्होंने राजा के पुत्र को सीधे महाराजा नंद, वृजेन्द्र-नंदन हरि के पुत्र के रूप में भी स्वीकार किया। वैदिक संस्कृति की दिशा के अनुसार यह पूर्ण दृष्टि है, जैसा कि श्रीमद भगवद-गीता में पुष्टि की गई है: पंडिताः सम-दर्शिनः। वैष्णव दर्शन के अनुसार परम सत्य की ऐसी स्वीकृति मुंडक उपनिषद (3.2.3) और कठ उपनिषद (1.2.23) दोनों में निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट की गई है:

नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो

 न मेधया ना बहुना श्रुतेन

यं एவைष वृणुते तेन लभ्यस

 तस्यैष आत्मा विवृणते तनूं स्वाम्

"सर्वोच्च भगवान विज्ञ विशेषज्ञता, विशाल बुद्धि अथवा अधिक श्रव्य से प्राप्त नहीं होते हैं। वह केवल उसी द्वारा प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं चुनता है। ऐसे व्यक्ति के लिए वह अपने स्वयं के रूप को प्रकट करता है।"

इस तरह की आध्यात्मिक दृष्टि के अभाव के कारण जीव भौतिक अस्तित्व में उलझ जाता है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने कल्याण-कल्पतरु में गाया है: संसारे आसिया प्रकृति भजिया 'पुरुष' अभिमाने मरि। जब जीव भौतिक संसार में आता है, तो वह स्वयं को भोक्ता समझता है। इस प्रकार वह अधिक से अधिक उलझता जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)