नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया ना बहुना श्रुतेन
यं एவைष वृणुते तेन लभ्यस
तस्यैष आत्मा विवृणते तनूं स्वाम्
"सर्वोच्च भगवान विज्ञ विशेषज्ञता, विशाल बुद्धि अथवा अधिक श्रव्य से प्राप्त नहीं होते हैं। वह केवल उसी द्वारा प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं चुनता है। ऐसे व्यक्ति के लिए वह अपने स्वयं के रूप को प्रकट करता है।"
इस तरह की आध्यात्मिक दृष्टि के अभाव के कारण जीव भौतिक अस्तित्व में उलझ जाता है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने कल्याण-कल्पतरु में गाया है: संसारे आसिया प्रकृति भजिया 'पुरुष' अभिमाने मरि। जब जीव भौतिक संसार में आता है, तो वह स्वयं को भोक्ता समझता है। इस प्रकार वह अधिक से अधिक उलझता जाता है।
