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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.12.56 
“आत्मा वै जायते पुत्रः” - एइ शास्त्र - वाणी ।
पुत्रेर मिलने येन मिलिबे आपनि ॥56॥
 
 
अनुवाद
“प्रकट शास्त्रों में यह संकेत दिया गया है कि पुत्र पिता का प्रतिनिधित्व करता है; इसलिए पुत्र का मुझसे मिलना राजा के मुझसे मिलने के समान ही अच्छा होगा।”
 
“The scriptures indicate that the son represents the father, so the meeting of his son with me will be like the meeting of his father with me.”
तात्पर्य
श्रीमद भागवतम (10.78.36) में यह कहा गया है, आत्मा वै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम्। वेदों में यह अनिवार्य किया गया है कि व्यक्ति अपने पुत्र के रूप में जन्म लेता है। पुत्र पिता से अलग नहीं होता है और यह प्रत्येक प्रकट शास्त्र में स्वीकार किया जाता है। ईसाई धर्मशास्त्र में यह माना जाता है कि ईश्वर का पुत्र क्राइस्ट भी ईश्वर है, या दूसरे शब्दों में कहें तो वे दोनों एक समान हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)