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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.12.38 
वस्त्र पाञा राजार हैल आनन्दित मन ।
प्रभु - रूप करि’ करे वस्त्रेर पूजन ॥38॥
 
 
अनुवाद
जब राजा को पुराना कपड़ा मिला, तो उसने उसकी पूजा ठीक उसी तरह करनी शुरू कर दी, जैसे वह व्यक्तिगत रूप से भगवान की पूजा करता था।
 
When the king found that old cloth, he started worshipping it just as he would worship Mahaprabhu himself.
तात्पर्य
यह भी वैदिक नियमों का निष्कर्ष है। क्योंकि भगवान सर्वोच्च सत्य हैं, उनके संबंध में सब कुछ एक ही स्तर पर है। राजा को श्री चैतन्य महाप्रभु से बहुत लगाव था और यद्यपि उन्होंने प्रभु को नहीं देखा था, फिर भी वह पहले ही भक्ति-सेवा के निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे। सर्वभौम भट्टाचार्य से वस्त्र प्राप्त करने के तुरंत बाद, राजा ने उसकी पूजा करना शुरू किया, इसे श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में स्वीकार किया। भगवान के वस्त्र, बिस्तर, चप्पल और सब कुछ जो एक साधारण आवश्यकता के रूप में आवश्यक है, वे सभी शेष, विष्णु, श्री बलदेव के विस्तार रूप हैं। इस प्रकार भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के वस्त्र और अन्य साज-सामान भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के ही अन्य रूप हैं। भगवान से जुड़ी हर चीज पूजनीय है। श्री चैतन्य महाप्रभु हमें निर्देश देते हैं कि जैसे कृष्ण पूजनीय हैं, उसी प्रकार कृष्ण का स्थान वृंदावन भी पूजनीय है। और जैसा कि वृंदावन पूजनीय है, उसी प्रकार वृंदावन का सामान - पेड़, सड़क, नदी, सब कुछ - पूजनीय है। इस प्रकार एक शुद्ध भक्त गाता है, जय जय वृंदावन-वासी यता जन: "वृंदावन के सभी निवासियों को प्रणाम!" यदि किसी भक्त का दृढ़ भक्ति भाव है, तो ये सभी निष्कर्ष हृदय में जागृत या प्रकट होंगे।

यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरु

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः

"केवल उन महान आत्माओं के लिए जिनकी भगवान और आध्यात्मिक गुरु दोनों में दृढ़ आस्था है, वैदिक ज्ञान के सभी पाठ स्वचालित रूप से प्रकट होते हैं।" (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.23)

इस प्रकार महाराज प्रतापरुद्र और अन्य भक्तों के पद चिन्हों पर चलते हुए, हमें भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के सभी संबंधितों की पूजा करना सीखना चाहिए। इसे भगवान शिव ने तदीयनाम कहा है। पद्म पुराण में कहा गया है:

आराधनानां सर्वेषां विष्णोरारादनं परम

तस्मात् परतरं देवी तदीयानां समर्चनम्

"हे देवी, पूजा की सबसे श्रेष्ठ प्रणाली भगवान विष्णु की पूजा है। उससे भी बढ़कर तदीय यानी विष्णु से संबंधित किसी भी चीज की पूजा है।" श्री विष्णु सच्चिदानंद-विग्रह हैं। इसी तरह, कृष्ण के सबसे गोपनीय सेवक, आध्यात्मिक गुरु और विष्णु के सभी भक्त तदीय हैं। सच्चिदानंद-विग्रह, गुरु, वैष्णव और उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली चीजों को तदीय माना जाना चाहिए और इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी जीवों द्वारा उनकी पूजा की जानी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)