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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.12.25 
तोमा - सबार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे ।
दामोदर कहे यबे, मिलि तबे ताँरे ॥25॥
 
 
अनुवाद
"मैं सभी भक्तों के अनुरोध पर राजा से नहीं मिलूँगा, लेकिन यदि दामोदर अनुमति देंगे तो मैं उनसे मिलूँगा।"
 
“I will not meet the king as requested by all of you devotees, but if Damodar says so, I will do so.”
तात्पर्य
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, एक सन्यासी सख्त मनाही है भौतिकवादी लोगों को देखें, विशेष रूप से एक राजा जो हमेशा पाउंड, शिलिंग और पेंस गिनने में लगा रहता है। वास्तव में, एक सन्यासी और एक राजा के बीच की बैठक को हमेशा घृणित माना जाता है। एक सन्यासी हमेशा सार्वजनिक आलोचना का विषय होता है, और उसकी थोड़ी सी गलती को जनता द्वारा गंभीरता से लिया जाता है। लोग वास्तव में एक सन्यासी से उपदेश देने की उम्मीद करते हैं न कि किसी सामाजिक या राजनीतिक मामले में भाग लेने की। यदि एक सन्यासी सार्वजनिक आलोचना का विषय है, तो उसका प्रचार फलदायी नहीं होगा। श्री चैतन्य महाप्रभु विशेष रूप से ऐसी आलोचना से बचना चाहते थे ताकि उनके उपदेश कार्य में कोई बाधा न आए। ऐसा हुआ कि जब प्रभु उस समय अपने शिष्यों से बात कर रहे थे, तो भक्त दामोदर पंडित उपस्थित थे। यह दामोदर पंडित बहुत ही निष्ठावान भक्त और श्री चैतन्य महाप्रभु का कट्टर प्रेमी था। जब भी ऐसा कुछ होता था जो प्रभु के चरित्र को छू या दाग सकता था, दामोदर पंडित तुरंत इसे इंगित करता, प्रभु की ऊंची स्थिति पर भी विचार नहीं करता। कभी-कभी यह कहा जाता है कि मूर्ख जहाँ फ़रिश्ते जाने से कतराते हैं, वहाँ भागते हैं, और श्री चैतन्य महाप्रभु दामोदर पंडित की मूर्खता को इंगित करना चाहते थे कि वह प्रभु की आलोचना करने के लिए आगे आया। यही कारण है कि भगवान ने कहा कि यदि दामोदर पंडित उन्हें अनुमति देंगे, तो वे राजा को देखने जाएंगे। इस कथन में गहरा अर्थ था, क्योंकि यह एक चेतावनी है कि दामोदर को अब भगवान की आलोचना करने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह एक भक्त के रूप में उनकी स्थिति के अनुकूल नहीं था। श्री चैतन्य महाप्रभु को उनके साथ रहने वाले सभी भक्तों का मार्गदर्शक और आध्यात्मिक गुरु माना जाता था। दामोदर पंडित उनमें से एक थे, और भगवान ने दामोदर पंडित को उन्हें और आलोचना करने से बचने के लिए चेतावनी देकर एक विशेष उपकार किया। एक भक्त या शिष्य को कभी भी भगवान या उनके प्रतिनिधि आध्यात्मिक गुरु की आलोचना करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)