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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 212
 
 
श्लोक  2.12.212 
प्रफुल्ल - कमल जिनि’ नयन - युगल ।
नीलमणि - दर्पण - कान्ति गण्ड झलमल ॥212॥
 
 
अनुवाद
भगवान जगन्नाथ की आँखें खिले हुए कमल के फूलों की सुन्दरता को जीत रही थीं, और उनकी गर्दन नीलमणि से बने दर्पण के समान चमकदार थी।
 
Lord Jagannatha's eyes were as beautiful as blooming lotuses and his neck shone like a mirror made of sapphire.
तात्पर्य
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु आमतौर पर भगवान जगन्नाथ को दूर से गरुड़ के स्तंभ के पीछे खड़े होकर ही देखते थे। लेकिन जब उन्हें पंद्रह दिनों से भगवान जगन्नाथ के दर्शन नहीं हुए, तो चैतन्य महाप्रभु को उनसे विरह का बहुत कष्ट हुआ। बड़ी उत्सुकता में, चैतन्य महाप्रभु ने सभा-मंडप को पार किया और उस कमरे में प्रवेश किया जहाँ भगवान जगन्नाथ को भोग लगाया जाता था, बस भगवान जगन्नाथ का मुखड़ा देखने के लिए। पद 210 में, इस कार्य को मर्यादा-लंघन कहा गया है, जो कि विनियमित सिद्धांतों का उल्लंघन है। यह इस बात को दर्शाता है कि किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के बहुत पास नहीं जाना चाहिए। भगवान की मूर्ति और आध्यात्मिक गुरु दोनों को ही दूर से ही देखना चाहिए। इसे मर्यादा कहा जाता है। अन्यथा, जैसा कि कहा गया है, बहुत अंतरंगता से उपेक्षा पैदा हो जाती है। कभी-कभी मूर्ति या आध्यात्मिक गुरु के बहुत पास जाने से नवदीक्षित भक्त का पतन हो जाता है। इसलिए मूर्ति और आध्यात्मिक गुरु के निजी सेवकों को हमेशा बहुत सावधान रहना चाहिए, क्योंकि लापरवाही के कारण उनके कर्तव्यों में बाधा आ सकती है।

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की आँखों की तुलना प्यासे भौंरों से की गई है, और श्री जगन्नाथ की आँखों की तुलना खिले हुए कमल के फूलों से की गई है। लेखक ने भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के भगवान जगन्नाथ के प्रति गहन प्रेम में डूबे होने का वर्णन करने के लिए इन तुलनाओं का उपयोग किया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)