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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.12.195 
हेन तोमार सङ्गे मोर एकत्रे भोजन ।
ना जानि, तोमार सङ्गे कैछे हय मन ॥195॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु ने आगे कहा, "आप तो एक अद्वैतवादी हैं! और अब मैं आपके पास बैठकर भोजन कर रहा हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरे मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।"
 
Nityananda Prabhu continued, "You are such a non-dualist! And I am now sitting next to you and eating. I wonder how this will affect my mind?"
तात्पर्य
साङ्गत संजायते काम: (भगवद्गीता 2.62)। कोई भी व्यक्ति समाज और संगति के अनुसार अपनी चेतना का विकास करता है। जैसे कि श्रील नित्यानंद प्रभु मानते हैं, भक्तों को उन लोगों के साथ संगति रखने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए जो भक्त नहीं हैं। जब एक गृहस्थ भक्त ने पूछा कि एक भक्त का व्यवहार कैसा होना चाहिए, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत उत्तर दिया:

असत-सङ्ग-त्याग,—एइ वैष्णव-आचार

'स्त्री-सङ्गी'—एका असां, 'कृष्णभक्त' आर

(चैतन्य चरितामृत मध्य लीला 22.87)

एक वैष्णव, एक भक्त को केवल गैर-भक्तों के साथ घनिष्ठ संगति को त्याग देना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने उपदेशामृत में घनिष्ठ रिश्तों के लक्षणों का इस तरह वर्णन किया है:

ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यं आख्याति पृच्छति

भुङ्क्ते भोजयते चैव षड-विधं प्रीति-लक्षणम्

भुङ्क्ते भोजयते शब्दों से संकेत मिलता है कि व्यक्ति को भक्तों के साथ खाना चाहिए। किसी को गैर-भक्तों द्वारा दिए गए भोजन को खाने से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। वास्तव में, एक भक्त को गैर-भक्त से भोजन न स्वीकार करने में बहुत सख्त होना चाहिए, खासकर रेस्तरां या होटलों या हवाई जहाज में तैयार किया गया भोजन। इस सिलसिले में श्रील नित्यानंद प्रभु का संदर्भ इस बात पर जोर देने के लिए है कि व्यक्ति को मायावादियों और सहजिया वैष्णवों जैसे गुप्त मायावादियों के साथ खाने से बचना चाहिए, जो भौतिक रूप से प्रभावित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)