श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  2.12.184 
काहाँ बहिर्मुख तार्किक - शिष्यगण - सङ्गे ।
काहाँ एइ सङ्ग - सुधा - समुद्र - तरङ्गे ॥184॥
 
 
अनुवाद
"जबकि मैं एक समय तर्क के अनुयायियों, सभी अभक्तों के साथ संगति करता था, अब मैं भक्तों की संगति रूपी अमृत सागर की लहरों में विलीन हो गया हूँ।"
 
“Where I used to live in the company of non-devotee logical disciples, now I am immersed in the waves of the ocean of nectar in the company of devotees.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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