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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  2.12.180 
काहाँ भट्टाचार्येर पूर्व जड़ - व्यवहार ।
काहाँ एइ परमानन्द, करह विचार ॥180॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य को उत्तम श्रेणी का प्रसाद देने के बाद, गोपीनाथ आचार्य बोले, "ज़रा सोचो कि भट्टाचार्य का पूर्व सांसारिक आचरण कैसा था! ज़रा सोचो कि इस समय वे किस प्रकार दिव्य आनंद का आनंद ले रहे हैं!"
 
After serving Bhattacharya a sumptuous meal, Gopinath Acharya said, "Just think about Bhattacharya's previous material conduct! Just think about the transcendental bliss he is enjoying now."
तात्पर्य
सर्वभौम भट्टाचार्य पहले स्मार्त-ब्राह्मण थे, यानी ऐसे लोग जो सांसारिक मंच पर वैदिक सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करते हैं। सांसारिक मंच पर कोई यह विश्वास नहीं कर सकता कि प्रसाद पारलौकिक है, कि गोविंद भगवान का मूल रूप है, या कि एक वैष्णव मुक्त व्यक्ति है। ये पारलौकिक विचार सामान्य वैदिक विद्वानों के अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं। अधिकांश वैदिक विद्वानों को वेदांती कहा जाता है। वेदांत दर्शन के ये तथाकथित अनुयायी परम सत्य को अवैयक्तिक मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि किसी विशेष जाति में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपनी मृत्यु तक और पुनर्जन्म होने तक अपनी जाति नहीं बदल सकता। स्मार्त-ब्राह्मण इस तथ्य को भी अस्वीकार करते हैं कि महाप्रसाद (देवता को चढ़ाया गया भोजन) पारलौकिक और भौतिक रूप से अदोषित है। मूल रूप से, सर्वभौम भट्टाचार्य सांसारिक मंच पर वैदिक सिद्धांतों के सभी नियमों और विनियमों से जुड़े थे। अब गोपीनाथ आचार्य ने बताया कि कैसे सर्वभौम भट्टाचार्य को श्री चैतन्य महाप्रभु की अकारण दया ने परिवर्तित किया था। परिवर्तित होने पर, सर्वभौम ने वैष्णवों के साथ प्रसाद लिया। वास्तव में, वह श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ बैठे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)