कोटि - सूर्य - सम सब - उज्वल - वरण ।
कभु नाहि शुनि एइ मधुर कीर्तन ॥95॥
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अनुवाद
"सचमुच, उनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है। मैंने कभी भगवान के नामों का इतना मधुर उच्चारण नहीं सुना।"
"Truly, his radiance is like that of a million suns. Nor have I ever heard such sweet chanting of the Lord's name before."
तात्पर्य
जब वे भजन गाते हैं तब शुद्ध भक्तों के लक्षण इस प्रकार होते हैं। सभी शुद्ध भक्त सूर्य-प्रकाश के समान उज्ज्वल हैं, और उनके शरीर से अत्यधिक तेज निकलता है। इसके अतिरिक्त, उनका संकीर्तन का प्रदर्शन बेजोड़ है। कई पेशेवर मंत्रमुग्ध हैं जो विभिन्न सामग्रीकीय उपकरणों के साथ कलानिधि और मधुर तरीके से सामूहिक गायन कर सकते हैं, पर उनका भजन शुद्ध भक्तों के सामूहिक भजन जैसा आकर्षक नहीं हो सकता। अगर एक भक्त वैष्णव व्यवहार को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों पर सख्त तरीके से अमल करता है, तो उसके शरीर से चमक स्वाभाविक रूप से आकर्षक होगी, और प्रभु के पवित्र नामों का उसका गान और भजन सार्थक होगा। ऐसे कीर्तन की लोग बिना किसी हिचकिचाहट के सराहना करेंगे। प्रभु चैतन्य या श्री कृष्ण के समय के ड्रामे भी भक्तों के द्वारा ही किए जाने चाहिए। ऐसे ड्रामे तुरंत दर्शको में उत्सुकता जगा देंगे, और उनमें बहुत शक्ति होगी। अंतरराष्ट्रीय कृष्ण चेतना संघ के छात्रों को इन दो बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए और प्रभु के गुणों के प्रसार में इन सिद्धांतों को लागू करने का प्रयास करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥