गौरान्गर संगी-गण नित्य-सिद्ध करी माने
से याया व्रजेन्द्र-सुत-पाश
जो बुद्धिमान है वह समझता है कि स्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी निजी सहयोगी और भक्त सदैव मुक्त हो गए हैं। इसका अर्थ है कि क्योंकि वे हमेशा भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, वे इस भौतिक संसार से संबंधित नहीं हैं। जो व्यक्ति पूरे चौबीसों घटे भगवान की भक्ति में लगा रहता है और भगवान को कभी नहीं भूलता उसे नित्य-सिद्ध कहा जाता है। श्रील रूप गोस्वामी इस कथन की पुष्टि करते हैं:
इहा यस्य हरेर दास्ये कर्मणा मनसा गिरा
निखास्स्वप्यवस्थसु जीवन्मुक्तः स उच्यते
“एक व्यक्ति जो कृष्ण की सेवा में शरीर, मन, बुद्धि और वचनों से कार्य करता है, वह भौतिक संसार में भी एक मुक्त व्यक्ति है, हालाँकि वह कई तथाकथित भौतिक गतिविधियों में लगा रह सकता है।” (भक्ति-रसामृत-सिंधु, 1.2.187)
एक भक्त हमेशा सोचता रहता है कि सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान, भगवान कृष्ण की बेहतर सेवा कैसे की जाए, और उनके नाम, प्रसिद्धि और गुणों को दुनिया भर में कैसे प्रसारित किया जाए। जो नित्य-सिद्ध है, उसके पास दुनिया भर में भगवान की महिमा का प्रसार करने के अलावा कोई और काम नहीं है। ऐसे लोग पहले से ही भगवान चैतन्य महाप्रभु के सहयोगी हैं। इसलिए नरवरदास ठाकुर कहते हैं, नित्य-सिद्ध करी माने। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु पांच सौ साल पहले व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे, केवल उनके सहयोगी ही मुक्त हुए थे। बल्कि, श्रील नरवरदास ठाकुर कहते हैं कि कोई भी नित्य-सिद्ध है यदि वह भगवान के पवित्र नाम की महिमा का प्रसार करके श्री चैतन्य महाप्रभु की ओर से कार्य करता है। हमें उन भक्तों का सम्मान नित्य-सिद्ध के रूप में करना चाहिए जो भगवान की महिमा का प्रचार करते हैं और उन्हें वातानुकूलित नहीं मानना चाहिए।
माम च यो व्यभिचारने भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतित्यैतान ब्रह्मा-भूयाय कल्पते
(भ.गी. 14.26)
जो भौतिक संसार के गुणों से ऊपर उठ गया है उसे ब्राह्म मंच पर कहा जाता है। वह नित्य-सिद्ध का मंच भी है। नित्य-सिद्ध न केवल ब्राह्म मंच पर रहता है बल्कि उस मंच पर काम भी करता है। केवल भगवान चैतन्य महाप्रभु के सहयोगियों को नित्य-सिद्ध के रूप में स्वीकार कर, कोई बहुत आसानी से घर वापस जा सकता है, वापस भगवान के पास।
