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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.11.8 
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भव - सागरस्य ।
सन्दर्शनं विषयिणामथ योषितां च हा हन्त हन्त विष - भक्षणतोऽप्यसाधु ॥8॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान ने अत्यन्त शोक प्रकट करते हुए सार्वभौम भट्टाचार्य को बताया, "अफसोस, जो व्यक्ति गंभीरतापूर्वक भवसागर को पार करने तथा भौतिक उद्देश्यों के बिना भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने की इच्छा रखता है, उसके लिए किसी भौतिकवादी को इन्द्रियतृप्ति में लिप्त देखना या उसी प्रकार की रुचि रखने वाली स्त्री को देखना, स्वेच्छा से विष पीने से भी अधिक घृणित है।"
 
Expressing great sorrow, Mahaprabhu told Sarvabhauma Bhattacharya, “Alas! For one who wishes to cross the ocean of existence and engage in the transcendental loving service of the Lord without any material motive, to look at a materialist engaged in sense gratification or a woman having such interests is more condemnable than deliberately consuming poison.”
तात्पर्य
यह श्री चैतन्य-चंद्रोदय नाटक (8.23) का एक उद्धरण है। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु आध्यात्मिक प्रगति के लिए सांसारिक दुनिया का त्याग करने वाले संन्यासी के लिए सिद्धांतों की घोषणा करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति जादू दिखाने और करतब दिखाने के लिए नहीं है बल्कि भौतिक दुनिया को पार करने और आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित होने के लिए है। पारं पारं जिगमिषोः का अर्थ है भौतिक दुनिया के दूसरी तरफ जाने की इच्छा करना। वैतरणी नाम की एक नदी है, और इस नदी के एक तरफ भौतिक दुनिया है, और दूसरी तरफ आध्यात्मिक दुनिया है। चूंकि वैतरणी नदी की तुलना एक महान समुद्र से की जाती है, इसलिए इसे भव-सागर, जन्म और मृत्यु के बार-बार होने वाले समुद्र का नाम दिया गया है। आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य जन्म और मृत्यु की इस पुनरावृत्ति को रोकना और आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करना है, जहां व्यक्ति हमेशा के लिए चेतन और आनंदमय रह सकता है।

दुर्भाग्य से, सामान्य लोग आध्यात्मिक जीवन या आध्यात्मिक दुनिया के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। आध्यात्मिक दुनिया का उल्लेख भगवद-गीता (8.20) में किया गया है:

परस तस्मात तु भवोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात सनातनः

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

"फिर भी एक और अप्रकट प्रकृति है, जो शाश्वत है और इस प्रकट और अप्रकट पदार्थ से परे है। यह सर्वोच्च है और कभी भी नष्ट नहीं होता है। जब इस दुनिया में सब कुछ नष्ट हो जाता है, तो वह हिस्सा जैसा है वैसा ही रहता है।"

इस प्रकार इस भौतिक दुनिया से परे एक आध्यात्मिक प्रकृति है, और वह आध्यात्मिक प्रकृति शाश्वत रूप से विद्यमान है। आध्यात्मिक उन्नति का अर्थ है भौतिक गतिविधियों को रोकना और आध्यात्मिक गतिविधियों में प्रवेश करना। यह भक्ति-योग की प्रक्रिया है। भौतिक दुनिया में, इंद्रिय सुख के लिए माध्यम मुख्य रूप से एक महिला है। जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में गंभीरता से रुचि रखता है उसे महिलाओं से सख्ती से बचना चाहिए। एक संन्यासी को भौतिक लाभ के लिए कभी भी किसी पुरुष या महिला को नहीं देखना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भौतिकवादी पुरुषों और महिलाओं से बात करना भी खतरनाक है, और उनकी तुलना जहर पीने से की जाती है। श्री चैतन्य महाप्रभु इस बिंदु पर बहुत सख्त थे। इसलिए उन्होंने राजा प्रतापरुद्र को मिलने से इनकार कर दिया, जो स्वाभाविक रूप से हमेशा राजनीतिक और आर्थिक मामलों में लगे रहते थे। भगवान ने सार्वभौम भट्टाचार्य जैसे व्यक्तित्व के अनुरोध के बावजूद, जो भगवान के अंतरंग मित्र और भक्त थे, राजा को देखने से भी इनकार कर दिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)