दुर्भाग्य से, सामान्य लोग आध्यात्मिक जीवन या आध्यात्मिक दुनिया के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। आध्यात्मिक दुनिया का उल्लेख भगवद-गीता (8.20) में किया गया है:
परस तस्मात तु भवोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात सनातनः
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति
"फिर भी एक और अप्रकट प्रकृति है, जो शाश्वत है और इस प्रकट और अप्रकट पदार्थ से परे है। यह सर्वोच्च है और कभी भी नष्ट नहीं होता है। जब इस दुनिया में सब कुछ नष्ट हो जाता है, तो वह हिस्सा जैसा है वैसा ही रहता है।"
इस प्रकार इस भौतिक दुनिया से परे एक आध्यात्मिक प्रकृति है, और वह आध्यात्मिक प्रकृति शाश्वत रूप से विद्यमान है। आध्यात्मिक उन्नति का अर्थ है भौतिक गतिविधियों को रोकना और आध्यात्मिक गतिविधियों में प्रवेश करना। यह भक्ति-योग की प्रक्रिया है। भौतिक दुनिया में, इंद्रिय सुख के लिए माध्यम मुख्य रूप से एक महिला है। जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में गंभीरता से रुचि रखता है उसे महिलाओं से सख्ती से बचना चाहिए। एक संन्यासी को भौतिक लाभ के लिए कभी भी किसी पुरुष या महिला को नहीं देखना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भौतिकवादी पुरुषों और महिलाओं से बात करना भी खतरनाक है, और उनकी तुलना जहर पीने से की जाती है। श्री चैतन्य महाप्रभु इस बिंदु पर बहुत सख्त थे। इसलिए उन्होंने राजा प्रतापरुद्र को मिलने से इनकार कर दिया, जो स्वाभाविक रूप से हमेशा राजनीतिक और आर्थिक मामलों में लगे रहते थे। भगवान ने सार्वभौम भट्टाचार्य जैसे व्यक्तित्व के अनुरोध के बावजूद, जो भगवान के अंतरंग मित्र और भक्त थे, राजा को देखने से भी इनकार कर दिया।
