"नैषां मतिस्तावदुरुक्रमंग्रिम
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः
महीयसांपादरजोऽभिषेकं
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्"
जब तक कोई विशुद्ध भक्त के पास नहीं जाता तब तक वह परमेश्वर को नहीं समझ सकता। महाराज प्रतापरुद्र ने रामानंद राय और सर्वभौम भट्टाचार्य दोनों की पूजा की। इस प्रकार उन्होंने विशुद्ध भक्तों के चरणकमलों का स्पर्श किया और श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचने में समर्थ हुए।
