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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.11.58 
रामानन्द राय, आजि तोमार प्रेम - गुण ।
प्रभु - आगे कहिते प्रभुर फिरि’ गेल मन ॥58॥
 
 
अनुवाद
“रामानंद राय द्वारा आपके शुद्ध प्रेम के वर्णन के कारण भगवान ने पहले ही अपना मन बदल लिया है।”
 
“Mahaprabhu has already changed his mind because of the description of your love that Ramanand Rai has given him.”
तात्पर्य
प्रारम्भ में प्रभु राजा से मिलना नहीं चाहते थे पर भट्टाचार्य और रामानंद राय के प्रयत्नो से प्रभु का मन परिवर्तित हुआ। प्रभु ने पहले ही घोषणा कर रखी थी कि कृष्ण भक्तों का सेवक होने के कारण राजा पर कृपा करेंगे। इसी प्रकार कृष्ण चेतना में उन्नति की जा सकती है। सर्वप्रथम भक्त की कृपा होनी चाहिए फिर कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है "यस्य प्रसादाद् भगवत् प्रसादो/यस्याप्रसादान्न गति कुतोऽपि"। इसलिए हमारा पहला कर्तव्य गुरुदेव को संतुष्ट करना है जो भगवद्-कृपा का प्रबंध कर सकते है। एक साधरण मानव को सर्वप्रथम गुरुदेव या भक्त की सेवा करनी चाहिए। फिर भक्त की कृपा के द्वारा भगवान संतुष्ट होते है। जब तक भक्त के चरणों की धूल मस्तक पर न पड़े तब तक उन्नति होने की कोई संभावना नहीं है। श्रीमद्भागवत (7.5.32) में भी प्रहलाद महाराज के वक्तव्य द्वारा इसकी पुष्टि की गयी है:

"नैषां मतिस्तावदुरुक्रमंग्रिम

स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः

महीयसांपादरजोऽभिषेकं

निष्किंचनानां न वृणीत यावत्"

जब तक कोई विशुद्ध भक्त के पास नहीं जाता तब तक वह परमेश्वर को नहीं समझ सकता। महाराज प्रतापरुद्र ने रामानंद राय और सर्वभौम भट्टाचार्य दोनों की पूजा की। इस प्रकार उन्होंने विशुद्ध भक्तों के चरणकमलों का स्पर्श किया और श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचने में समर्थ हुए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)