Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.11.57 
बाह्य - ज्ञान नाहि, से - काले कृष्ण - नाम शुनि, ।
आलिङ्गन करिबेन तोमाय ‘वैष्णव’ ‘जानि’ ॥57॥
 
 
अनुवाद
"भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु बाह्य चेतना से रहित, परमानंद प्रेम की अवस्था में होंगे। उस समय, जब तुम श्रीमद्भागवतम् के उन अध्यायों का पाठ करोगे, वे तुम्हें शुद्ध वैष्णव जानकर, तुम्हें आलिंगन में ले लेंगे।"
 
"Sri Chaitanya Mahaprabhu will be completely lost in his love. At that very moment, you should begin reciting those chapters from the Srimad Bhagavatam. Then, knowing you to be a pure Vaishnava, he will embrace you."
तात्पर्य
वैष्णव सदैव दूसरे वैष्णव को परम सत्य की प्राप्ति की ओर बढ़ने में सहायता के लिए तत्पर रहते हैं । सर्वभौम भट्टाचार्य राजा को एक शुद्ध वैष्णव के रूप में समझते थे। राजा सदैव श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में चिंतन करते रहते थे और भट्टाचार्यगण उन्हें भगवान तक पहुँचने में सहायता करना चाहते थे। वैष्णव सदैव दयालु होता है, विशेषकर तब जब वह किसी संभावित भक्त को अत्यंत दृढ़ (दृढ़-व्रत) निश्चय युक्त पाता है। परिणामतः भट्टाचार्य राजा की सहायता के लिए तैयार थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)