यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः
"केवल उन महान आत्माओं को ही वैदिक ज्ञान के सभी अर्थ अपने आप प्रकट होते हैं जो भगवान और आध्यात्मिक गुरु दोनों पर पूर्ण विश्वास रखते हैं।" (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.23)
महाराज प्रतापरुद्र का भट्टाचार्य में दृढ़ विश्वास था, जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को भगवान का परम व्यक्तित्व घोषित किया था। अपने आध्यात्मिक गुरु के रूप में भट्टाचार्य में दृढ़ विश्वास रखने के कारण, राजा प्रतापरुद्र ने तुरंत श्री चैतन्य महाप्रभु को सर्वोच्च भगवान के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार उन्होंने अपने मन में श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा शुरू की। यह भक्ति सेवा की प्रक्रिया है। भगवद-गीता (9.34) में भगवान कृष्ण के अनुसार:
मन-मना भव मद्-भक्तो माँ-याजी माँ नमस्कुरु
माँ एवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्-परायणः
"अपने मन को हमेशा मुझे सोचने में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे प्रणाम करो और मेरी पूजा करो। मुझमें पूरी तरह से तल्लीन रहते हुए, तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे।"
यह प्रक्रिया बहुत सरल है। केवल आध्यात्मिक गुरु द्वारा यह दृढ़ विश्वास होना ही आवश्यक है कि कृष्ण भगवान का परम व्यक्तित्व हैं। यदि कोई यह निर्णय लेता है, तो वह कृष्ण के बारे में सोचकर, कृष्ण का जप करके और उनका गुणगान करके और अधिक प्रगति कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसा पूर्ण समर्पित भक्त भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करेगा। श्रील सर्वभौम भट्टाचार्य इसे और आगे समझाते हैं।
