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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.11.50 
एत शुनि’ सार्वभौम हइला चिन्तित ।
राजार अनुराग देखि’ हइला विस्मित ॥50॥
 
 
अनुवाद
राजा प्रतापरुद्र का निश्चय सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य विचारमग्न हो गए। वास्तव में, राजा का निश्चय देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ।
 
Upon hearing King Prataparudra's resolve, Sarvabhauma became worried. He was astonished by the king's resolve.
तात्पर्य
सर्वभौम भट्टाचार्य आश्चर्यचकित थे क्योंकि ऐसी दृढ़ता भौतिक भोगों से जुड़े एक सांसारिक व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। राजा के पास निश्चित रूप से भौतिक भोग के लिए पर्याप्त अवसर थे, लेकिन वह सोच रहे थे कि अगर वह श्री चैतन्य महाप्रभु को नहीं देख पाते हैं तो उनका राज्य और बाकी सब कुछ बेकार है। यह निश्चित रूप से विस्मय का पर्याप्त कारण है। श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है कि भक्ति, भक्ति सेवा बिना शर्त होनी चाहिए। कोई भी भौतिक बाधा वास्तव में भक्ति सेवा की उन्नति को नहीं रोक सकती है, चाहे वह किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा की जाए या राजा द्वारा। किसी भी मामले में, भगवान को प्रदान की जाने वाली भक्ति सेवा हमेशा पूर्ण होती है, भक्त की भौतिक स्थिति के बावजूद। भक्ति सेवा इतनी श्रेष्ठ है कि इसे कोई भी किसी भी स्थिति में कर सकता है। बस दृढ़-व्रत होना चाहिए, दृढ़ निश्चयी होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)