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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.11.48 
ताँर प्रतिज्ञा - मोरे ना करिबे दरशन ।
मोर प्रतिज्ञा - ताँहा विना छाड़िब जीवन ॥48॥
 
 
अनुवाद
महाराज प्रतापरुद्र ने आगे कहा, "यदि श्री चैतन्य महाप्रभु मुझे न देखने के लिए दृढ़ हैं, तो मैं भी उन्हें न देख पाने पर अपने प्राण त्यागने के लिए दृढ़ हूँ।
 
Maharaja Prataparudra further said, “If Sri Chaitanya Mahaprabhu has resolved not to see me, then I am also determined that if I do not get His darshan, I will give up my life.”
तात्पर्य
कृष्ण-चेतना में प्रगति करने में महाराजा प्रतापरुद्र के निश्चयवाले एक भक्त निश्चित रूप से विजयी होंगे। श्री कृष्ण भगवद्-गीता (9.14) में इसकी पुष्टि करते हैं:

सतातं कीर्तयन्तो माम् यतन्तश्च दृढ़-व्रताः

नमस्यन्तश्च माम् भक्त्या नित्य-युक्तोपासते

"हमेशा मेरे महिमा का कीर्तन करते हुए, महान निश्चय से प्रयास करते हुए, मेरे सामने नतमस्तक होकर, ये महान आत्माएँ निरंतर भक्ति से मेरी उपासना करती हैं।"

ये भगवान की सेवा में पूर्ण कृष्ण-चेतना में लगे हुए एक महात्मा के लक्षण हैं। इस प्रकार, महाराजा प्रतापरुद्र का निश्चय बहुत ऊँचा माना जाता है और इसे दृढ़-व्रत कहा जाता है। इस दृढ़ निश्चय के कारण, वह अंततः भगवान चैतन्य की प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त करने में सफल हुए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)