श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.11.4 
प्रभु कहे, - कह तुमि, नाहि कि छु भय ।
योग्य हैले करिब, अयोग्य हैले नय ॥4॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने भट्टाचार्य को आश्वासन दिया कि वे बिना किसी भय के बोल सकते हैं, किन्तु साथ ही यह भी कहा कि यदि उनका कथन उपयुक्त हुआ तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे, और यदि उपयुक्त नहीं हुआ तो वे उसे अस्वीकार कर देंगे।
 
Mahaprabhu assured Bhattacharya that he should speak his mind without any fear, but also said that he would accept his views only if they were appropriate, otherwise he would reject them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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