श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.11.38 
आमि कि करिब, मन इहाँ लञा आइल ।
जगन्नाथ - दरशने विचार ना कैल ॥38॥
 
 
अनुवाद
श्री रामानन्द राय ने आगे कहा, "मैं क्या करूँ? मेरा मन मुझे यहाँ खींच लाया है। मैं पहले भगवान जगन्नाथ के मंदिर जाने के बारे में सोच ही नहीं पा रहा था।"
 
Shri Ramanand Rai continued, "What should I do? My heart brought me here. I couldn't even think of going to the Jagannath temple before."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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