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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.11.31 
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम् ।
तस्मात्परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥31॥
 
 
अनुवाद
[भगवान शिव ने देवी दुर्गा से कहा:] 'हे देवी, यद्यपि वेदों में देवताओं की पूजा का निर्देश है, भगवान विष्णु की पूजा सर्वोच्च है। तथापि, भगवान विष्णु की पूजा से भी बढ़कर, भगवान विष्णु के संबंधी वैष्णवों की सेवा करना है।'
 
"(Lord Shiva said to Goddess Durga:) 'O Goddess, although the worship of the gods is recommended in the Vedas, the worship of Lord Vishnu is supreme. But even greater than the service of Lord Vishnu is the service of the Vaishnavas, who are related to Lord Vishnu.'"
तात्पर्य
हिंदी - अनुवाद : वेदों को तीन विभागों में विभाजित किया गया है - कर्म-काण्ड, ज्ञान-काण्ड और उपासना-काण्ड। ये हैं फलप्रद कामकाज के साथ काम करने की गतिविधियाँ, दार्शनिक अनुमान और पूजा। वेदों में विभिन्न देवताओं की पूजा के लिए और भी भगवान विष्णु के लिए सिफारिशें हैं। पद्म पुराण के इस उद्धरण में, भगवान शिव देवी दुर्गा द्वारा उनसे पूछे गये सवाल का जवाब देते हैं। यह छंद श्रील रूप गोस्वामी के लघु-भागवतामृत (2.4) में भी शामिल है। शब्द विष्णोर अराधनम का अर्थ भगवान विष्णु या कृष्ण की पूजा करना है। इस प्रकार पूजा का सर्वोच्च रूप भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के लिए है, श्री कृष्ण। यह आगे निष्कर्ष निकाला गया है कि भगवान विष्णु की पूजा करने वाला भगवान कृष्ण के भक्त की पूजा करके बेहतर सेवा करता है। वहाँ विभिन्न प्रकार के भक्त हैं - शांता-रस में, दास्य-रस में, सख्य-रस में, वात्सल्य-रस में और माधुर्य-रस में। यद्यपि सभी रस पारलौकिक मंच पर हैं, फिर भी माधुर्य-रस सर्वोच्च पारलौकिक मधुरता है। परिणामस्वरूप यह निष्कर्ष निकाला गया है कि माधुर्य-रस में प्रभु के भक्तों की पूजा आध्यात्मिक गतिविधि है। श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके अनुयायी मुख्य रूप से माधुर्य-रस में भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। अन्य वैष्णव आचार्यों ने वात्सल्य-रस तक पूजा की सिफारिश की। इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने अपने विदग्ध-माधव (1.2) में श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ को सर्वोच्च रूप में वर्णित किया है:

अनर्पित-चरीं चिरत करूणयावतीर्णः कलौ

समर्पयितुम उन्नतोज्ज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रीयम्

श्री चैतन्य महाप्रभु माधुर्य-रस की सर्वोच्च श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने के लिए कली युग में प्रकट हुए, जो उपहार पहले किसी आचार्य या अवतार द्वारा नहीं दिया गया था। परिणामस्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु को सबसे बड़े अवतार के रूप में स्वीकार किया जाता है। वह केवल एक ही हैं जिन्होंने कृष्ण के प्रति प्रेम को बांटा जबकि वैवाहिक रस में कृष्ण से प्रेम करने की सर्वोच्च श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)