आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम् ।
मद्भक्त - पूजाभ्यधिका सर्व - भूतेषु मन्मतिः ॥29॥
मदर्थेष्व ङ्ग - चेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् ।
मय्यर्पणं च मनसः सर्व - काम - विवर्जनम् ॥30॥
अनुवाद
"मेरे भक्त मेरी सेवा में अत्यंत सावधानी और आदर रखते हैं। वे अपने समस्त अंगों से मुझे नमस्कार करते हैं। वे अन्य भक्तों की पूजा करते हैं और सभी जीवों को मुझसे संबंधित पाते हैं। वे अपनी समस्त शरीर की शक्ति मेरे लिए समर्पित करते हैं। वे अपनी वाणी की शक्ति को मेरे गुणों और स्वरूप के गुणगान में लगाते हैं। वे अपने मन को भी मुझमें समर्पित करते हैं और सभी प्रकार की भौतिक इच्छाओं का त्याग करने का प्रयास करते हैं। मेरे भक्तों की यही विशेषता है।"
“My devotees serve me with great devotion and respect. They offer obeisances to me with all their limbs. They worship my other devotees and consider all beings to be related to me. They devote all their physical strength to me. They use their words to extol the glories of my qualities and form. They also surrender their minds to me and strive to renounce all material desires. These are the characteristics of my devotees.”
तात्पर्य
ये दो श्लोक श्रीमद् भागवत (11.19.21-22) से उद्धृत किए गये हैं। वे भगवान श्री कृष्ण ने कहे थे, जब उद्धव ने उनसे भक्ति सेवा के बारे में पूछा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)