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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 209
 
 
श्लोक  2.11.209 
नाना पिठा - पाना खाय आकण्ठ पूरिया ।
मध्ये मध्ये ‘हरि’ कहे आनन्दित ह ञा ॥209॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने तरह-तरह के केक और मीठे चावल खाकर अपना पेट भर लिया और बीच-बीच में बड़े हर्ष से भगवान का पवित्र नाम जपते रहे।
 
He ate all kinds of sweets and kheer to his heart's content and in between he joyfully chanted the holy name of 'Hari'.
तात्पर्य
**हिंदी रूपांतरण:**

वैष्णव प्रसादम ग्रहण करते समय अंतराल पर भगवान हरि के पवित्र नाम का जाप करते हैं और विभिन्न भजन गाते हैं, जैसे कि 'शरीर अविद्या-जाल'। जो प्रसाद का सम्मान करते हैं, देवता को अर्पित भोजन के बचे हुए हिस्से को ग्रहण करते हैं, उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रसाद обычная भोजन नहीं है। प्रसाद पारलौकिक है। इसलिए हमें स्मरण कराया जाता है:

महा-प्रसादे गोविंदे नाम-ब्रह्मणि वैष्णवे

स्वल्प-पुण्य-वतां राजन विश्वासो नैव जायते

जो पवित्र नहीं हैं वे महा-प्रसाद या भगवान के पवित्र नाम के मूल्य को नहीं समझ सकते। प्रसाद और भगवान का नाम दोनों ब्रह्म तल या अध्यात्मिक तल पर हैं। किसी को भी प्रसाद को होटल के साधारण खाना पकाने जैसा नहीं समझना चाहिए। न ही किसी को देवता को अर्पित न किए गए किसी भी प्रकार के भोजन को छूना चाहिए। प्रत्येक वैष्णव इस सिद्धांत का कड़ाई से पालन करता है और वह कोई भी भोजन ग्रहण नहीं करता जो प्रसाद न हो। व्यक्ति को प्रसाद को बड़ी श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिए और भगवान के पवित्र नाम का जाप करना चाहिए और मंदिर में देवता की पूजा करनी चाहिए। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि देवता, महा-प्रसाद और पवित्र नाम सांसारिक तल से संबंध नहीं रखते हैं। देवता की पूजा, प्रसाद ग्रहण करने और हरि कृष्ण महामंत्र का जाप करने से, व्यक्ति हमेशा अध्यात्मिक तल (ब्रह्म-भूयाय कल्पते) पर बना रह सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)