Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  2.11.192 
अहो बत श्व - पचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥192॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब निम्नलिखित श्लोक पढ़ा: "हे प्रभु, जो व्यक्ति सदैव आपके पवित्र नाम को अपनी जिह्वा पर धारण करता है, वह दीक्षित ब्राह्मण से भी महान हो जाता है। यद्यपि वह कुत्ते खाने वाले कुल में जन्मा हो और इसलिए भौतिक गणना के अनुसार मनुष्यों में सबसे नीच हो, फिर भी वह गौरवशाली है। यह भगवान के पवित्र नाम के जप का अद्भुत प्रभाव है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि जो व्यक्ति भगवान के पवित्र नाम का जप करता है, उसे वेदों में वर्णित सभी प्रकार की तपस्या और महान यज्ञों को संपन्न करने वाला समझा जाना चाहिए। वह सभी पवित्र तीर्थस्थलों में स्नान कर चुका है। उसने सभी वेदों का अध्ययन कर लिया है, और वह वास्तव में एक आर्य है।"
 
Then Sri Chaitanya Mahaprabhu recited this verse: “O Lord, one who always keeps Your holy name on his tongue becomes superior to an initiated Brahmin. Even if he is born in a Chandala family and is therefore considered extremely low from a material point of view, he is still praiseworthy. This is the wonderful effect of chanting the holy name of the Lord. Therefore, the conclusion to be drawn is that one who chants the holy name of the Lord has accomplished all the austerities and sacrifices mentioned in the Vedas; he has bathed in all the holy places; he has studied all the Vedas and is truly an Arya.”
तात्पर्य
आर्यन शब्द का अर्थ उन्नत होता है | जब तक कोई आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं होता, तब तक उसे आर्यन नहीं कहा जा सकता है, और ये आर्यन और आन-आर्यन के बीच का अंतर है | आन-आर्यन वे हैं जो आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हैं | वैदिक संस्कृति का पालन करके, महान बलिदान करते हुए और वैदिक निर्देशों का सख्ती से पालन करके, व्यक्ति ब्राह्मण, संन्यासी या आर्यन बन सकता है | उचित रूप से योग्य हुए बिना ब्राह्मण, संन्यासी या आर्यन बनना संभव नहीं है | भागवत-धर्म कभी भी किसी को सस्ता ब्राह्मण, संन्यासी या आर्यन बनने की अनुमति नहीं देता है | यहाँ वर्णित गुण या योग्यताएँ श्रीमद-भागवतम (3.33.7) से उद्धृत हैं और कपितलदेव की माँ देवहूति द्वारा बोली गई थीं, जब उन्होंने भक्ति-योग के प्रभाव को समझा | इस तरह देवहूति ने भक्त की प्रशंसा की, हर तरह से उसकी महानता को इंगित करते हुए |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)