मायावादी दार्शनिक गुरु और सेवक की समानता को मात्रा के संदर्भ में समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे यह समझाने में विफल रहते हैं कि यदि गुरु और सेवक समान हैं, तो नौकर माया का शिकार क्यों बनता है। वे यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जब सेवक, जीवित प्राणी, माया के चंगुल से बाहर निकलता है, तो वह तुरंत तथाकथित गुरु बन जाता है। ऐसा स्पष्टीकरण कभी भी संतोषजनक नहीं होता। असीमित होने के कारण, गुरु माया का शिकार नहीं बन सकता, क्योंकि ऐसे मामले में उसकी असीमता अपंग या सीमित होगी। इस प्रकार मायावाद विवरण सही नहीं है। तथ्य यह है कि गुरु हमेशा गुरु और असीमित होता है, और सीमित होने के कारण, नौकर को कभी-कभी माया के प्रभाव से काट दिया जाता है। माया भी गुरु की ऊर्जा है और असीमित भी है; इसलिए सीमित सेवक या सीमित जीवित इकाई को गुरु या गुरु की क्षमता, माया के अधीन रहने के लिए मजबूर किया जाता है। माया के प्रभाव से मुक्त होकर, फिर से एक शुद्ध सेवक बन सकता है और गुणात्मक रूप से प्रभु के बराबर हो सकता है। गुरु और शिष्य के बीच संबंध उनकी असीमित और सीमित होने के कारण क्रमशः जारी रहता है।
