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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 189
 
 
श्लोक  2.11.189 
प्रभु कहे, - तोमा स्पर्शि पवित्र हइते ।
तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते ॥189॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "मैं तुम्हें केवल शुद्ध करने के लिए स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम्हारी शुद्ध गतिविधियाँ मुझमें विद्यमान नहीं हैं।"
 
Mahaprabhu said, “I want to touch you to become pure, because I do not have pure deeds like you.”
तात्पर्य
यह गुरु और शिष्य के बीच की भावनाओं के पारस्परिकता का एक उदाहरण है। शिष्य सोचता है कि वह सबसे अधिक अपवित्र है और गुरु उसे छुए नहीं, और गुरु को लगता है कि क्योंकि वह बहुत सी अपवित्र जीवित संस्थाओं के साथ जुड़कर अपवित्र हो गया है, इसलिए स्वयं को शुद्ध करने के लिए उसे हरिदास ठाकुर जैसे शुद्ध भक्त को छूना चाहिए। वास्तव में, सेवक और गुरु दोनों पहले से ही शुद्ध हैं क्योंकि उनमें से कोई भी भौतिक अस्तित्व की अशुद्धियों के संपर्क में नहीं है। वे पहले से ही गुणवत्ता में समान हैं क्योंकि वे दोनों सबसे शुद्ध हैं। हालांकि, मात्रा में अंतर है, क्योंकि गुरु असीमित है और सेवक सीमित है। नतीजतन सेवक हमेशा गुरु के अधीनस्थ रहता है, और यह रिश्ता शाश्वत और अविचलित है। जैसे ही सेवक गुरु बनने जैसा महसूस करता है, वह माया में गिर जाता है। इस प्रकार यह स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग करके है कि कोई माया के प्रभाव में आता है।

मायावादी दार्शनिक गुरु और सेवक की समानता को मात्रा के संदर्भ में समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे यह समझाने में विफल रहते हैं कि यदि गुरु और सेवक समान हैं, तो नौकर माया का शिकार क्यों बनता है। वे यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जब सेवक, जीवित प्राणी, माया के चंगुल से बाहर निकलता है, तो वह तुरंत तथाकथित गुरु बन जाता है। ऐसा स्पष्टीकरण कभी भी संतोषजनक नहीं होता। असीमित होने के कारण, गुरु माया का शिकार नहीं बन सकता, क्योंकि ऐसे मामले में उसकी असीमता अपंग या सीमित होगी। इस प्रकार मायावाद विवरण सही नहीं है। तथ्य यह है कि गुरु हमेशा गुरु और असीमित होता है, और सीमित होने के कारण, नौकर को कभी-कभी माया के प्रभाव से काट दिया जाता है। माया भी गुरु की ऊर्जा है और असीमित भी है; इसलिए सीमित सेवक या सीमित जीवित इकाई को गुरु या गुरु की क्षमता, माया के अधीन रहने के लिए मजबूर किया जाता है। माया के प्रभाव से मुक्त होकर, फिर से एक शुद्ध सेवक बन सकता है और गुणात्मक रूप से प्रभु के बराबर हो सकता है। गुरु और शिष्य के बीच संबंध उनकी असीमित और सीमित होने के कारण क्रमशः जारी रहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)