श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 187
 
 
श्लोक  2.11.187 
दुइ - जने प्रेमावेशे क रेन क्रन्दने ।
प्रभु - गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य - गुणे ॥187॥
 
 
अनुवाद
तब प्रभु और उनका सेवक दोनों प्रेम से भावविभोर होकर रोने लगे। सचमुच, प्रभु अपने सेवक के गुणों से रूपांतरित हो गए, और सेवक अपने स्वामी के गुणों से रूपांतरित हो गया।
 
Then both Mahaprabhu and his servant (Haridasa) began to weep out of love. The Lord was moved by the virtue of his servant, and the servant by the virtue of his master.
तात्पर्य
मायावादी तत्त्वों का कहना है कि जीव और परम भगवान् में कोई भेद नहीं है, और इस तरह जीव के परिवर्तन को भगवान् के परिवर्तन के समान बताते हैं। दूसरे शब्दों में मायावादी कहते हैं कि जीव प्रसन्न हो तो भगवान् भी प्रसन्न होते हैं, और जीव दुखी हो तो भगवान् भी दुखी होते हैं। शब्दों के इस प्रकार हेर-फेर करके मायावादी यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि जीव और भगवान् में कोई भेद नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है। इस पद में कृष्णदास कविराज गोस्वामी व्याख्या करते हैंः प्रभु-गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य-गुणे। भगवान् और जीव समान नहीं हैं, क्योंकि भगवान् सदैव स्वामी हैं और जीव सदैव सेवक। परिवर्तन दिव्य गुणों के कारण होता है, और इस प्रकार यह कहा जाता है कि भगवान् का सेवक भगवान् का हृदय है और भगवान् सेवक का हृदय हैं। भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता (4.11) में भी इसी की व्यख्या की हैः

ये यथा माम् प्रपद्यन्ते ताम्स तथैव भजाम्य अहम्

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

“जिस प्रकार से भी वे सभी मेरी शरण में आते हैं, मैं भी उसी तरह से उनका भजन करता हूँ। हे पृथा के पुत्र, मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।”

भगवान् अपने सेवक के दिव्य गुणों के कारण सेवक को बधाई देने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं। सेवक भगवान् की प्रसन्नता से सेवा करता है, और भगवान् भी बड़ी प्रसन्नता के साथ उसका प्रतिफल देते हुए सेवक की और भी अधिक सेवा करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)