Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 176
 
 
श्लोक  2.11.176 
सेइ घर आमाके देह’ - आछे प्रयोजन ।
निभृते वसिया ताहाँ करिब स्मरण ॥176॥
 
 
अनुवाद
"कृपया वह कमरा मुझे दे दीजिए, क्योंकि मुझे इसकी आवश्यकता है। मैं उस एकांत स्थान पर बैठकर भगवान के चरणकमलों का स्मरण करूँगा।"
 
"Give me that room, because I need it. I will sit in that secluded place and meditate on the Lord's lotus feet."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु इस कथन का काफी महत्व है। निभृते वसिया ताहाॅ करिबा स्मरण: "मैं उस एकांत स्थान में बैठकर भगवान के चरणकमलों का स्मरण करूँगा।" नए छात्रों को एकांत स्थान पर बैठकर हरि कृष्ण महामंत्र का जप करते हुए भगवान के चरणकमलों का स्मरण करने की नकल नहीं करनी चाहिए। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि यह स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु थे, जो स्वयं या हरिदास ठाकुर के लिए एकांत स्थान चाहते थे। कोई व्यक्ति अचानक हरिदास ठाकुर के स्तर तक नहीं पहुँच सकता है और एकांत स्थान पर बैठकर हरि कृष्ण महामंत्र का जप करने और भगवान के चरणकमलों को याद करने के लिए बैठ सकता है। केवल हरिदास ठाकुर या श्री चैतन्य महाप्रभु जैसे विशिष्ट व्यक्ति, जो व्यक्तिगत रूप से आचार्य के लिए उचित व्यवहार का प्रदर्शन कर रहे हों, ही इस तरह के अभ्यास में शामिल हो सकते हैं।

वर्तमान समय में हम देख रहे हैं कि कृष्ण चेतना के लिए अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी के कुछ सदस्य एकांत स्थान पर बैठने के लिए अपने उपदेश गतिविधियों को छोड़ने की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं। यह बहुत अच्छा संकेत नहीं है। यह एक सच्चाई है कि श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने नौसिखियों के लिए इस प्रक्रिया की निंदा की है। उन्होंने एक गीत में भी कहा है, प्रतिष्ठा तरे, निर्जनरा घरे, तव हरि-नाम केवल कैतव: "एकान्त स्थान पर बैठकर हरि कृष्ण महामंत्र का जप करने का विचार एक धोखा माना जाता है"। यह प्रथा नौसिखियों के लिए बिल्कुल भी संभव नहीं है। एक नौसिखिया भक्त को आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में बहुत मेहनत से काम करना चाहिए, और उसे इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ का प्रचार करना चाहिए। भक्ति में परिपक्व होने के बाद ही वह श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह हरि कृष्ण महामंत्र का जप करने के लिए एकांत स्थान पर बैठ सकता है। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, लेकिन हमें सबक सिखाने के लिए उन्होंने लगातार छह वर्षों तक पूरे भारत की यात्रा की और तभी जगन्नाथ पुरी में सेवानिवृत्त हुए। जगन्नाथ पुरी में भी भगवान ने जगन्नाथ मंदिर में कई बड़ी सभाओं में हरि कृष्ण महामंत्र का जप किया। मुद्दा यह है कि किसी को भी अपने आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत में हरिदास ठाकुर की नकल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पहले व्यक्ति को भक्ति के परिपक्व होने चाहिए और इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु की स्वीकृति प्राप्त करनी चाहिए। केवल ऐसे समय में ही वह वास्तव में एकांत स्थान पर शांति से बैठकर हरि कृष्ण महामंत्र का जप कर सकता है और भगवान के चरणकमलों को याद कर सकता है। इंद्रियां बहुत मजबूत होती हैं, और यदि एक नौसिखिया भक्त हरिदास ठाकुर की नकल करता है, तो उसके दुश्मन (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) उसे परेशान करेंगे और थका देंगे। हरि कृष्ण महामंत्र का जप करने के बजाय, नौसिखिया केवल गहरी नींद सोएगा। उपदेश कार्य उन्नत भक्तों के लिए है, और जब एक उन्नत भक्त भक्ति के क्रम में और ऊपर उठता है, तो वह एकांत स्थान पर हरि कृष्ण मंत्र का जप करने के लिए सेवानिवृत्त हो सकता है। हालाँकि, यदि कोई केवल उन्नत आध्यात्मिक जीवन की नकल करता है, तो वह गिर जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे वृंदावन में सहजिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)