हरिदास कहे , - मुञि नीच - जाति छार ।
मन्दिर - निकटे याइते मोर नाहि आधिकार ॥165॥
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अनुवाद
हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, "मैं मंदिर के पास नहीं जा सकता क्योंकि मैं नीच जाति का, घृणित व्यक्ति हूँ। मुझे वहाँ जाने का कोई अधिकार नहीं है।"
Haridasa Thakura replied, "I cannot go near the temple, because I am a low-caste, wretched person. I have no right to go there."
तात्पर्य
यद्यपि हरिदास ठाकुर इतने उच्च वैष्णव थे कि उन्हें हरिदास गोस्वामी के रूप में संबोधित किया जाता था, फिर भी उन्हें अभी भी सामान्य लोगों की सामान्य समझ को भंग करना पसंद नहीं था। हरिदास ठाकुर इतने उच्च थे कि उन्हें ठाकुर और गोसाईं के रूप में संबोधित किया जाता था, और ये उपाधियाँ सबसे उन्नत वैष्णवों को प्रदान की जाती हैं। आध्यात्मिक गुरु को आम तौर पर गोसाईं कहा जाता है, और ठाकुर का उपयोग परमहंसों को संबोधित करने के लिए किया जाता है, जो आध्यात्मिकता के शीर्ष श्रेणी में हैं। फिर भी, हरिदास ठाकुर मंदिर के पास नहीं जाना चाहते थे, यद्यपि उन्हें स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ बुलाया था। जगन्नाथ मंदिर अभी भी केवल उन हिंदुओं को स्वीकार करता है जो वर्णाश्रम व्यवस्था में हैं। अन्य जातियाँ, विशेषकर जो हिंदू नहीं हैं, उन्हें मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यह एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था है, और इस प्रकार हरिदास ठाकुर, हालांकि निश्चित रूप से सक्षम और मंदिर में प्रवेश करने के लिए योग्य थे, फिर भी वह उसके पास भी नहीं जाना चाहते थे। इसे वैष्णव विनम्रता कहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥