ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः
मनः-षष्ठानींद्रियाणि प्रकृति-स्थाँनि कर्षति
"इस वातानुकूलित दुनिया में जीवित संस्थाएँ मेरे शाश्वत अंश हैं। वातानुकूलित जीवन के कारण, वे मन सहित छह इंद्रियों से बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं।"
इस प्रकार प्रत्येक जीवित व्यक्ति इस भौतिक प्रकृति में कठिन संघर्ष कर रहा है। वास्तव में जीवात्मा भगवान का अभिन्न अंग है, और जब वह भगवान की सर्वोच्च विभूति के सामने आत्मसमर्पण करता है, तो वह जन्म और मृत्यु के सागर से मुक्ति प्राप्त करता है। भगवान, गिरी हुई आत्माओं के प्रति दयालु होने के नाते, जीवित संस्था को अज्ञान के सागर से बाहर निकालने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। यदि जीवित संस्था अपनी स्थिति को समझती है और भगवान के सामने आत्मसमर्पण करती है, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।
