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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  2.11.151 
निमजतोऽनन्त भवार्णवान्तश् चिराय मे कुलमिवासि लब्धः ।
त्वयापि लब्धं भगवन्निदानीम् अनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः ॥151॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे अनंत! यद्यपि मैं अज्ञान के सागर में डूबा हुआ था, फिर भी बहुत समय के बाद, अब मैंने आपको प्राप्त कर लिया है, जैसे कोई समुद्र तट को प्राप्त कर सकता है। हे प्रभु, मुझे प्राप्त करके, आपने उस योग्य व्यक्ति को प्राप्त कर लिया है जिस पर आप अपनी अहैतुकी कृपा कर सकते हैं।
 
"O Lord! O Infinite! Although I was immersed in the ocean of ignorance, now, after a long time, I have found You, just as one finds the shore of the sea. O Lord, by finding me, You have found a suitable person on whom You can bestow Your causeless mercy."
तात्पर्य
यह स्तोत्र-रत्न से पद 21 है, जिसकी रचना आलबंदारू यमुनाचार्य ने की थी। भगवान की सर्वोच्च विभूति के साथ संबंध फिर से स्थापित किया जा सकता है, भले ही कोई अज्ञान के सागर में गिर गया हो, जो कि भौतिक अस्तित्व का सागर है जिसमें जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग का दुष्चक्र शामिल है, जो सभी भौतिक शरीर को स्वीकार करने से उत्पन्न होते हैं। भौतिक जीवन की 8,400,000 प्रजातियाँ हैं, लेकिन मानव शरीर में कोई जन्म और मृत्यु के दुष्चक्र से मुक्ति प्राप्त करने का अवसर प्राप्त करता है। जब कोई भगवान का भक्त बन जाता है, तो उसे जन्म और मृत्यु के इस खतरनाक सागर से बचाया जाता है। भगवान हमेशा दयनीय भौतिक स्थितियों से जूझ रही गिरी हुई आत्माओं पर अपनी दया बरसाने के लिए तैयार रहते हैं। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भागवद-गीता (15.7) में कहा है:

ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः

मनः-षष्ठानींद्रियाणि प्रकृति-स्थाँनि कर्षति

"इस वातानुकूलित दुनिया में जीवित संस्थाएँ मेरे शाश्वत अंश हैं। वातानुकूलित जीवन के कारण, वे मन सहित छह इंद्रियों से बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं।"

इस प्रकार प्रत्येक जीवित व्यक्ति इस भौतिक प्रकृति में कठिन संघर्ष कर रहा है। वास्तव में जीवात्मा भगवान का अभिन्न अंग है, और जब वह भगवान की सर्वोच्च विभूति के सामने आत्मसमर्पण करता है, तो वह जन्म और मृत्यु के सागर से मुक्ति प्राप्त करता है। भगवान, गिरी हुई आत्माओं के प्रति दयालु होने के नाते, जीवित संस्था को अज्ञान के सागर से बाहर निकालने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। यदि जीवित संस्था अपनी स्थिति को समझती है और भगवान के सामने आत्मसमर्पण करती है, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)