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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  2.11.138 
यद्यपि मुकुन्द - आमा - सङ्गे शिशु हैते ।
ताँहा हैते अधिक सुख तोमारे देखते ॥138॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "यद्यपि मुकुन्द मेरे बचपन के मित्र हैं, फिर भी मुझे उनसे मिलने की अपेक्षा आपके दर्शन में अधिक आनंद आता है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “Although Mukunda is my childhood friend, I am much happier to see you than he is.”
तात्पर्य
वासुदेव दत्त, मुकुन्द दत्त के बड़े भाई थे, जो कि श्री चैतन्य महाप्रभु के बचपन के मित्र थे। स्वाभाविक रूप से मित्र को देखकर बहुत आनन्द होता है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव दत्त को सूचित किया कि यद्यपि अपने मित्र को देखकर भी उन्हें खुशी हुई, लेकिन बड़े भाई को देखकर उनकी खुशी और बढ़ गई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)