श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 135-136
 
 
श्लोक  2.11.135-136 
अद्वैत कहे , - ईश्वरेर एइ स्वभाव हय ।
यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वैश्वर्य - मय ॥135॥
तथापि भक्त - सङ्गे हय सुखोल्लास ।
भक्त - सङ्गे करे नित्य विविध विलास ॥136॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य प्रभु ने उत्तर दिया, "यह भगवान का स्वाभाविक गुण है। यद्यपि वे स्वयं सम्पूर्ण और समस्त ऐश्वर्यों से युक्त हैं, फिर भी उन्हें अपने भक्तों की संगति में दिव्य आनंद मिलता है, जिनके साथ उनकी अनेकानेक शाश्वत लीलाएँ होती हैं।"
 
Advaita Acharya Prabhu replied, “This is the natural quality of the Supreme Personality of Godhead. Although He Himself is complete and endowed with all opulences, He enjoys transcendental bliss by performing various daily pastimes in the company of His devotees.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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