श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  2.11.118 
यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्म - भावितः ।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥118॥
 
 
अनुवाद
“‘जब कोई भगवान से प्रेरित होता है, जो हर किसी के हृदय में विराजमान है, तो वह सामाजिक रीति-रिवाजों या वैदिक नियामक सिद्धांतों की परवाह नहीं करता।’”
 
“When a person is inspired by the Lord seated in his heart, he cares neither for social customs nor for Vedic laws.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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