यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्म - भावितः ।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥118॥
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अनुवाद
“‘जब कोई भगवान से प्रेरित होता है, जो हर किसी के हृदय में विराजमान है, तो वह सामाजिक रीति-रिवाजों या वैदिक नियामक सिद्धांतों की परवाह नहीं करता।’”
“When a person is inspired by the Lord seated in his heart, he cares neither for social customs nor for Vedic laws.”
तात्पर्य
नारद गोस्वामी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा प्राप्त करने की शिक्षा भगवत पुराण (4.29.46) में दी गई है। नारदजी महाराज ने महाराज प्रचीनाबर्हि को यह शिक्षा पुरञ्जन की कथा के सन्दर्भ में दी थी। यहाँ नारदजी इंगित कर रहे हैं कि भगवान की कृपा के बिना कोई भी वेदों के अधिकार क्षेत्र से बंधी कामना-प्रधान क्रियाओं से मुक्त नहीं हो सकता। पिछली आयतों (भगवत पुराण 4.29.42–44) में नारदजी स्वीकार करते हैं कि भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, मनु, प्रजापतियों (दक्ष प्रधान), चार कुमारों, मारीच, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और स्वयं नारदजी भी भगवान की अकारण दया को ठीक से प्राप्त नहीं कर सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥