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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  2.10.67 
नित्यानन्द, जगदानन्द, मुकुन्द, दामोदर ।
चारि - जने युक्ति तबे करिला अन्तर ॥67॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, अन्य भक्त - नित्यानंद प्रभु, जगदानंद, मुकुंद और दामोदर के नेतृत्व में - एक निश्चित योजना पर विचार करने लगे।
 
After this, Nityananda Prabhu, Jagadananda, Mukunda and other devotees like Damodar started thinking of some solution.
तात्पर्य
भले ही किसी व्यक्ति को भगवान के व्यक्तित्व के परम रूप द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो, भगवान के भक्त उसे अस्वीकार नहीं करते; इसलिए भगवान के भक्त स्वयं भगवान से भी अधिक दयालु होते हैं। श्रील नरसिंह दास ठाकुर इस प्रकार गाते हैं, छाड़िया वैष्णव-सेवा निस्तार पायेचे कैबा : व्यक्ति शुद्ध भक्तों की सेवा में संलग्न हुए बिना भौतिक चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता। स्वयं भगवान कभी-कभी बहुत कठोर हो सकते हैं, लेकिन भक्त हमेशा दयालु होते हैं। इस प्रकार काला कृष्णदास को ऊपर बताए गए चार भक्तों की दया प्राप्त हुई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)