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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.10.55 
निज - गृह - वित्त - भृत्य - पञ्च - पुत्र - सने ।
आत्मा समर्पि लुँ आमि तोमार चरणे ॥55॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुग्रह की सराहना करते हुए, भवानंद राय ने भी कहा, "मैं अपने घर, धन, सेवकों और पाँच पुत्रों के साथ आपके चरण कमलों में समर्पण करता हूँ।
 
Praising the mercy of Sri Chaitanya Mahaprabhu, Bhavananda Rai also said, “I surrender to your lotus feet along with my house, wealth, servants and five sons.
तात्पर्य
यह समर्पण की प्रक्रिया है। जैसा कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर गाते हैं:

मानस, देह, गेह, यो किछु मोरा

अर्पिलुं तुया पदे नंद-किशोरा!

(शरणागति)

जब कोई भगवान के चरण कमलों में समर्पण करता है, तो वह अपने पास मौजूद हर चीज़ के साथ समर्पण करता है - उसका घर, उसका शरीर, उसका मन और उसके पास जो कुछ भी है। यदि इस समर्पण प्रक्रिया में कोई बाधा है, तो व्यक्ति को तुरंत बिना किसी आसक्ति के उसे छोड़ देना चाहिए। यदि कोई अपने सभी परिवार के सदस्यों के साथ समर्पण कर सकता है, तो उसे संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। हालाँकि, यदि समर्पण प्रक्रिया तथाकथित परिवार के सदस्यों द्वारा बाधित होती है, तो व्यक्ति को समर्पण प्रक्रिया को पूरा करने के लिए तुरंत उन्हें छोड़ देना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)