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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.10.54 
राय कहे , - आमि शूद्र, विषयी, अधम ।
तबु तुमि स्पर्श, - एइ ईश्वर - लक्षण ॥54॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की स्तुति सुनकर, भवानंद राय ने कहा, "मैं समाज व्यवस्था की चौथी श्रेणी में हूँ और सांसारिक कार्यों में संलग्न रहता हूँ। यद्यपि मैं अत्यंत पतित हूँ, फिर भी आपने मुझे स्पर्श किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि आप साक्षात् भगवान हैं।"
 
Hearing Sri Chaitanya Mahaprabhu's praise, Bhavananda Raya pleaded, "I am the fourth of four (a Shudra) and a being engaged in worldly pursuits. I am extremely fallen, yet you touched me. This is proof that you are the Supreme Personality of Godhead."
तात्पर्य
जैसा कि भगवद्-गीता (5.18) में कहा गया है:

विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि

शुनी चैव श्व-पाके च पण्डिताः सम-दर्शिनः

"विनम्र ऋषि सच्चे ज्ञान के बल पर एक विद्वान और सौम्य ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ता और एक कुत्ता खाने वाला [अछूत] सभी को समान दृष्टि से देखते हैं।"

जो लोग आध्यात्मिक समझ में अत्यधिक उन्नत होते हैं, वे किसी व्यक्ति की भौतिक स्थिति की परवाह नहीं करते हैं। एक आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति प्रत्येक जीव की आध्यात्मिक पहचान को देखता है, और परिणामस्वरूप वह एक विद्वान ब्राह्मण, एक कुत्ते, चंडाल या किसी और के बीच कोई भेद नहीं करता है। वह भौतिक शरीर से प्रभावित नहीं होता है बल्कि व्यक्ति की आध्यात्मिक पहचान को देखता है। इसलिए भवानंद राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु के कथन की सराहना की, जिससे पता चला कि भगवान ने भवानंद राय की सामाजिक स्थिति पर विचार नहीं किया, जो सांसारिक गतिविधियों में लिप्त शूद्र जाति के थे। इसके बजाय, प्रभु ने भवानंद राय की आध्यात्मिक स्थिति पर विचार किया, साथ ही रामानंद राय और उनके भाइयों के साथ। प्रभु का सेवक भी इसी तरह का होता है। वह किसी भी व्यक्ति - किसी भी जीव - को शरण देता है, भले ही वह ब्राह्मण परिवार का हो या चंडाल परिवार का। आध्यात्मिक गुरु सभी लोगों को अपना लेता है और हर किसी को आध्यात्मिक जीवन में प्रोत्साहित करता है। ऐसे भक्त की शरण लेकर कोई अपने जीवन को सफल बना सकता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (2.4.18) में पुष्टि की गई है:

कीरात-हूणांध्र-पुलिंद-पुलकाशा

आभीर-शुम्भा यवनाः खसादयः

येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः

शुध्यंति तस्मै प्रभविष्णवे नमः

"कीरात, हूण, आंध्र, पुलिंद, पुलकाश, आभीर, शुम्भ, यवन और खश जातियों के सदस्य, और यहां तक कि वे भी जो पापपूर्ण कृत्यों के आदी हैं, भगवान के भक्तों की शरण लेने से शुद्ध किए जा सकते हैं, जिनकी सर्वोच्च शक्ति है। मैं उन्हें अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करता हूं।"

जो कोई भी भगवान या उनके शुद्ध भक्त की शरण लेता है, वह आध्यात्मिक स्थिति में ऊंचा हो जाता है और भौतिक संदूषण से शुद्ध हो जाता है। इसकी पुष्टि भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (9.32) में भी की है:

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पाप-योनिषु

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम्

"हे पृथा के पुत्र, जो लोग मेरी शरण लेते हैं, भले ही वे निम्न जन्म के हों - स्त्रियाँ, वैश्य [व्यापारी] और शूद्र [श्रमिक] - वे भी परम गंतव्य प्राप्त कर सकते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)