Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.10.46 
प्रहरराज महापात्र इँह महा - मति ।
परमानन्द महापात्र इँहार संहति ॥46॥
 
 
अनुवाद
"ये परमानंद प्रहरराज हैं, जिन्हें महापात्र भी कहा जाता है। ये बहुत ही बुद्धिमान हैं।"
 
"This is Paramananda Prahararaj, also known as Mahapatra. He is extremely intelligent."
तात्पर्य
प्रहारराज ब्राह्मणों को दी गई एक पदवी है जो राजा का प्रतिनिधित्व करते हैं जब सिंहासन खाली हो। उड़ीसा में, राजा की मृत्यु और दूसरे राजा के सिंहासन पर बैठने के बीच, एक प्रतिनिधि को सिंहासन पर बैठना पड़ता है। इस प्रतिनिधि को प्रहारराज कहा जाता है। प्रहारराज को आमतौर पर राजा के निकट के पुजारियों के परिवार से चुना जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु के समय प्रहारराज परमानंद प्रहारराज थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)