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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.10.181 
प्रेम विना कभु नहे ताँर साक्षात्कार ।
इँहार कृपाते हय दरशन इँहार ॥181॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण के प्रति परमानंद प्रेम के बिना, कोई उन्हें प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकता। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से, ब्रह्मानंद भारती को भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है।"
 
"Krishna – without love, we cannot have a direct vision of Him. Therefore, by the grace of Sri Chaitanya Mahaprabhu, Brahmananda Bharati was able to have a vision of the Lord."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "तुम ब्रह्मानंद भारती हो, एक उन्नत भक्त जो परमानंदपूर्वक परमेश्वर से प्रेम करता है। इसलिए तुम कृष्ण को हर जगह देखते हो और इसमें कोई संदेह नहीं है।" सर्वभौम भट्टाचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु और ब्रह्मानंद भारती के बीच मध्यस्थ थे और उनका निर्णय यह था कि ब्रह्मानंद भारती जैसे उन्नत भक्त कृष्ण की कृपा से कृष्ण को देख रहे हैं। कृष्ण स्वयं को एक उन्नत भक्त के दर्शन के सामने प्रकट करते हैं। चूंकि ब्रह्मानंद भारती एक उन्नत भक्त थे, उन्होंने कृष्ण को श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्ति में देखा। ब्रह्म-संहिता (5.38) के शब्दों में:

प्रेमानजना-चुरिता-भक्ति-विलोचनेन

 संतः सदैव हृदयेषु विलोकयति

यं श्यामसुंदरमचिन्त्य-गुण-स्वरूपं

 गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

"मैं आदिम प्रभु, गोविंद की पूजा करता हूं, जो भक्त द्वारा हमेशा देखा जाता है जिसकी आँखें प्रेम के गूदे से अभिषेक की जाती हैं। उन्हें भक्त के हृदय में स्थित श्यामसुंदर के अपने शाश्वत रूप में देखा जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)