स्व-निगमम अपहाय मत्-प्रतिज्ञां
ऋतम् अधिकर्तुम अवप्लुतो रथ-स्थः
धृता-रथ-चरणोऽभ्ययाच्चलद्-गुर
हरिर इव हंतुं विभम गतोत्तरीयः
"मेरी इच्छा को पूरा करते हुए और अपने वचन का बलिदान करते हुए, वह रथ से उतरे, उसका पहिया उठाया और जल्दी से मेरी ओर दौड़े, जैसे कि एक शेर हाथी को मारने जाता है। रास्ते में उन्होंने अपना बाहरी वस्त्र भी गिरा दिया।"
कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की लड़ाई में न लड़ने का वादा किया था, लेकिन भीष्म ने कृष्ण के वादे को तोड़ने के लिए अर्जुन पर इतनी जोरदार तरीके से हमला किया कि कृष्ण को रथ का पहिया उठाकर भीष्म पर हमला करना पड़ा। यह दिखाने के लिए भगवान ने ऐसा किया कि उनके भक्त का पालन-पोषण उनके अपने वचन के बलिदान पर किया जा रहा है। ब्रह्मानंद भारती ने कहा, "अपने जीवन की शुरुआत से ही मैं अवैयक्तिक ब्रह्मा साक्षात्कार से जुड़ा था, लेकिन जैसे ही मैंने आपको देखा, मैं भगवान के व्यक्तित्व, कृष्ण से बहुत अधिक जुड़ गया।" इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान कृष्ण हैं, और इस तरह ब्रह्मानंद भारती उनके भक्त बन गए।
