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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  2.10.175 
आजन्म करिनु मुञि ‘निराका र’ - ध्यान ।
तोमा देखि’ ‘कृष्ण’ हैल मोर विद्यमान ॥175॥
 
 
अनुवाद
“मैं जन्म से ही निराकार ब्रह्म का ध्यान करता रहा हूँ, किन्तु जब से मैंने आपको देखा है, मैंने कृष्ण का पूर्ण अनुभव कर लिया है।”
 
“I have been meditating on the impersonal Brahman since birth, but ever since I saw you, I have fully realized Krishna.”
तात्पर्य
ब्रह्मानंद भारती ने स्वीकार किया कि जब आध्यात्मिक गुरु और शिष्य के बीच बहस हो तो आध्यात्मिक गुरु स्वाभाविक रूप से विजयी होता है, हालांकि शिष्य एक मजबूत तर्क पेश कर सकता है। दूसरे शब्दों में, यह प्रथागत है कि आध्यात्मिक गुरु के शब्द एक शिष्य के शब्दों से अधिक पूजा करने योग्य होते हैं। परिस्थितियों में, चूंकि ब्रह्मानंद भारती एक आध्यात्मिक गुरु के पद पर थे, वह श्री चैतन्य महाप्रभु पर विजयी हुए, जो खुद को ब्रह्मानंद भारती का शिष्य मानते थे। हालाँकि, ब्रह्मानंद भारती ने तर्क को उलट दिया और एक भक्त की स्थिति ले ली, यह कहते हुए कि श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण थे। इसका मतलब यह है कि भगवान अपने भक्त के प्रति स्नेह के कारण स्वेच्छा से पराजित हुए। उन्हें स्वेच्छा से हराया गया, क्योंकि कोई भी सर्वोच्च भगवान को नहीं हरा सकता। इस संबंध में, श्रीमद्-भागवतम (1.9.37) में भीष्म के शब्द महत्वपूर्ण हैं:

स्व-निगमम अपहाय मत्-प्रतिज्ञां

 ऋतम् अधिकर्तुम अवप्लुतो रथ-स्थः

धृता-रथ-चरणोऽभ्ययाच्चलद्-गुर

 हरिर इव हंतुं विभम गतोत्तरीयः

"मेरी इच्छा को पूरा करते हुए और अपने वचन का बलिदान करते हुए, वह रथ से उतरे, उसका पहिया उठाया और जल्दी से मेरी ओर दौड़े, जैसे कि एक शेर हाथी को मारने जाता है। रास्ते में उन्होंने अपना बाहरी वस्त्र भी गिरा दिया।"

कृष्ण ने कुरुक्षेत्र की लड़ाई में न लड़ने का वादा किया था, लेकिन भीष्म ने कृष्ण के वादे को तोड़ने के लिए अर्जुन पर इतनी जोरदार तरीके से हमला किया कि कृष्ण को रथ का पहिया उठाकर भीष्म पर हमला करना पड़ा। यह दिखाने के लिए भगवान ने ऐसा किया कि उनके भक्त का पालन-पोषण उनके अपने वचन के बलिदान पर किया जा रहा है। ब्रह्मानंद भारती ने कहा, "अपने जीवन की शुरुआत से ही मैं अवैयक्तिक ब्रह्मा साक्षात्कार से जुड़ा था, लेकिन जैसे ही मैंने आपको देखा, मैं भगवान के व्यक्तित्व, कृष्ण से बहुत अधिक जुड़ गया।" इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान कृष्ण हैं, और इस तरह ब्रह्मानंद भारती उनके भक्त बन गए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)