सर्वभौम भट्टाचार्य ब्राह्मण और एक साक्षात्कृत आत्मा थे, जबकि प्रतापरुद्र एक क्षत्रिय थे। क्षत्रिय राजा विद्वान ब्राह्मणों और संतों के आदेशों का बहुत ईमानदारी से पालन करते थे और इस प्रकार वे अपने देश पर शासन किया करते थे। उसी तरह वैश्यों को राजा के आदेशों का पालन करना होता था, और शूद्रों को तीनों उच्च जातियों की सेवा करनी होती थी। इस तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहकारी रूप से रहते थे और अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। परिणामस्वरूप समाज शांतिपूर्ण था और लोग कृष्ण भावना के कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम थे। इस प्रकार वे इस जीवन में सुखी थे और भगवान के पास अपने घर लौटने में सक्षम थे।
