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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.10.17 
राजा कहे , - भट्ट तुमि विज्ञ - शिरोमणि ।
तुमि ताँरे ‘कृष्ण’ कह, ताते सत्य मानि ॥17॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "भट्टाचार्य, आप मेरे जानने वाले सबसे विद्वान और अनुभवी व्यक्ति हैं। इसलिए जब आप श्री चैतन्य महाप्रभु को भगवान कृष्ण कहकर संबोधित करते हैं, तो मैं इसे सत्य मानता हूँ।"
 
The king said, "O Bhattacharya, you are the most learned and experienced person I know. Therefore, when you call Sri Chaitanya Mahaprabhu Lord Krishna, I accept it as truth.
तात्पर्य
आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नति करने का यही मार्ग है। आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए एक आचार्य, एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु के कथनों को स्वीकार करना चाहिए। सफलता का यही रहस्य है। लेकिन, आपका मार्गदर्शक एक ऐसा आध्यात्मिक गुरु होना चाहिए जो वास्तव में एक निर्मल भक्त हो और पूर्व आचार्य के निर्देशों का कड़ाई से और बिना किसी विचलन के पालन करता हो। शिष्य को अपने आध्यात्मिक गुरु की हर बात माननी चाहिए। सफलता तभी निश्चित है। यही वैदिक व्यवस्था है।

सर्वभौम भट्टाचार्य ब्राह्मण और एक साक्षात्कृत आत्मा थे, जबकि प्रतापरुद्र एक क्षत्रिय थे। क्षत्रिय राजा विद्वान ब्राह्मणों और संतों के आदेशों का बहुत ईमानदारी से पालन करते थे और इस प्रकार वे अपने देश पर शासन किया करते थे। उसी तरह वैश्यों को राजा के आदेशों का पालन करना होता था, और शूद्रों को तीनों उच्च जातियों की सेवा करनी होती थी। इस तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहकारी रूप से रहते थे और अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। परिणामस्वरूप समाज शांतिपूर्ण था और लोग कृष्ण भावना के कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम थे। इस प्रकार वे इस जीवन में सुखी थे और भगवान के पास अपने घर लौटने में सक्षम थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)