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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  2.10.169 
चर्म घुचाञा कैल आमारे शोधन ।
दोंहार व्याप्य - व्यापकत्वे एइ त’ कारण ॥169॥
 
 
अनुवाद
"श्री चैतन्य महाप्रभु ने मेरा मृगचर्म उतारकर मुझे पवित्र किया। यह इस बात का प्रमाण है कि वे सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं और मैं उनके अधीन हूँ।"
 
"Sri Chaitanya Mahaprabhu has freed me from the deerskin and made me pure. This is proof that He is omnipresent and omnipotent, and I am under His control."
तात्पर्य
ब्रह्मानंद भारती यहाँ यह प्रतिपादन करते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु परब्रह्म हैं और वह स्वयं सापेक्ष ब्रह्म हैं। इसकी पुष्टि वेदों में भी मिलती है: नित्यो नित्यानाम चेतनश् चेतनाम्। भगवान परमपुरुष स्वयं ब्रह्म या परब्रह्म हैं, जो सभी जीवों के स्वामी हैं। परब्रह्म या भगवान और जीव दोनों ही व्यक्ति हैं, परन्तु परब्रह्म स्वामी हैं जबकि जीव पराधीन है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)