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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  2.10.154 
ब्रह्मानन्द परियाछे मृग - चर्माम्बर ।
ताहा दे खि’ प्रभु दुःख पाइला अन्तर ॥154॥
 
 
अनुवाद
जब श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्त उनके पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि वे मृगचर्म से ढके हुए हैं। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु बहुत दुःखी हुए।
 
When Sri Chaitanya Mahaprabhu and his devotees approached him, they saw that he was wearing a deerskin. This made Sri Chaitanya Mahaprabhu very sad.
तात्पर्य
ब्रह्मानंद भारती शंकराचार्य-सम्प्रदाय से सम्बद्ध थे। (भारती उपाधि उस सम्प्रदाय के संन्यासियों के दस वर्गों में से एक वर्ग का परिचायक है।) जिस व्यक्ति ने संसार को त्याग दिया हो, सांसारिक संपदा का परित्याग कर दिया हो, उसके शरीर को हिरन की खाल अथवा किसी वृक्ष की छाल से ढक कर रखना परम्परागत है। मनु-संहिता में भी इस बात का विधान है। परन्तु यदि संसार से विरक्त सन्यासी हिरन की खाल का आवरण धारण भर करता है, और आध्यात्मिक प्रगति नहीं करता, तो वह मिथ्या प्रतिष्ठा में फंस जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु को ब्रह्मानंद भारती का हिरन की खाल पहने रहना अच्छा नहीं लगता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)